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संभावनाओं के बावजूद

Sun, 01 Dec 2013 07:42 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Sun, 01 Dec 2013 07:42 PM IST
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Despite prospects

मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में आर्थिक विकास दर तुलनात्मक रूप से थोड़ी बढ़ी जरूर है, पर क्या इससे सचमुच कोई उम्मीद बनती है!

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इसमें शक नहीं कि स्थिति धीरे-धीरे सुधर रही है। कृषि क्षेत्र की बात करें, तो खरीफ के बाद रबी उत्पादन में भी बढ़ोतरी के संकेत हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों के आक्रोश से रबी की बुआई पिछड़ने की आशंका के बावजूद ताजा आंकड़े अकेले उत्तर प्रदेश में गेहूं बुआई के रकबे में बढ़ोतरी की तस्दीक करते हैं। कुछ बुनियादी उद्योगों में सुधार के बाद मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में बेहतरी की संभावना बन रही है। चूंकि अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य पहले से बेहतर हुआ है, इस कारण निर्यात सुधरा है।

पहली तिमाही में जो आर्थिक चुनौतियां थीं, वे भी अब उतनी बड़ी नहीं रहीं। उदाहरण के लिए, रुपये की स्थिति मजबूत है, चालू खाते का घाटा थोड़ा कम हुआ है, और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के प्रति जो आशंका थी, वह भी फिलहाल दूर हो गई है। कायदे से हमारी अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए ये कारण काफी होने चाहिए। बीच-बीच में शेयर बाजार में इन्हीं सब वजहों से उछाल दिखता भी है।
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लेकिन अब भी कुछ चुनौतियां ऐसी हैं, जिनके हल की जल्दी उम्मीद नहीं है। इनमें से खाद्य मुद्रास्फीति सबसे बड़ी चुनौती है। एक आंकड़ा बता रहा है कि फल-सब्जी और दाल के दाम में आई तेजी से पौष्टिक खाद्य पदार्थों का उपभोग 40 फीसदी कम हो गया है! मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने की चुनौती इतनी बड़ी है कि उदारवादी समझे जाने वाले रिजर्व बैंक गवर्नर रघुराम राजन को रेपो दर बढ़ाने का फैसला लेना पड़ा। ब्याज दरों में कमी न होने से देश में उद्योगों के लिए अनुकूल वातावरण नहीं बन पा रहा।
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सर्वाधिक हताशाजनक यह कि लोकसभा चुनाव नजदीक होने के कारण खुद मनमोहन सिंह सरकार के एजेंडे में अभी आर्थिक सुधार नहीं है। उद्योग-धंधे और निवेश के लिए माहौल बनाना तो दूर, उलटे राजकोषीय घाटा कम करने के लिए केंद्र सरकार ने खर्चों में भारी कमी कर दी है। यानी सुधरते वैश्विक परिदृश्य के कारण आर्थिक बेहतरी की जो संभावना हमारे यहां सरकारी कोशिशों से बन सकती थी, चुनावी वर्ष होने के कारण उस पर भी फिलहाल ग्रहण लग गया है।

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