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इतनी चेतावनियों के बावजूद

Mon, 08 Jul 2013 04:23 PM IST
Updated Mon, 08 Jul 2013 04:23 PM IST
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despite many warnings

बोधगया के चर्चित महाबोधि मंदिर में हुए सिलसिलेवार बम विस्फोटों से कोई बड़ा नुकसान बेशक न हुआ हो, लेकिन इस हमले का संदेश अधिक क्षुब्ध करने वाला है।

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हाल के दौर में महाबोधि मंदिर के बारे में जितने अलर्ट जारी किए गए, उतने शायद ही किसी और स्थान के बारे में किए गए होंगे।

म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों और बौद्धों के बीच हुई हिंसा के बाद से ही जेहादी आतंकी संगठनों ने बौद्ध ठिकानों पर हमले की धमकियां दी थीं। लश्कर के सरगना हाफिज सईद ने तो यहां तक कहा था कि म्यांमार से मुस्लिमों को बाहर निकालने में भारत म्यांमार सरकार की मदद कर रहा है।
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उसी दौरान खुफिया ब्यूरो ने महाबोधि मंदिर के बारे में अलर्ट जारी किया था। इस साल की शुरुआत में दिल्ली पुलिस के हाथ आए इंडियन मुजाहिदीन के कुछ सदस्यों ने खुलासा किया था कि वे महाबोधि मंदिर की रेकी कर आए हैं।
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आतंकियों की नजर पिछले कुछ समय से इस मंदिर पर थी, तो इसकी वजहें हैं। चूंकि बोधगया में पवित्र पीपल के पेड़ के नीचे गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था, इसलिए दुनिया भर के बौद्धों के लिए यह आकर्षण का केंद्र है।

दलाई लामा से लेकर महिंदा राजपक्षे जैसी शख्सियतों का यहां आना-जाना लगा रहता है। पर इतनी चेतावनियों के बावजूद इस मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने की गंभीर कोशिश नहीं हुई। रविवार को मंदिर में एक खास परिक्रमा होती है, और उसी दिन तड़के विस्फोट होना बताता है कि सुरक्षा की स्थिति क्या रही होगी।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने न सिर्फ सुरक्षा के मोर्चे पर चरम नाकामी दिखाई, बल्कि वह यह तक नहीं भांप पाए कि भाजपा से अलगाव के बाद ऐसे हमले का राजनीतिक नुकसान उन्हें कहीं ज्यादा उठाना पड़ सकता है!


आतंकी हमले के बाद मुख्य विपक्षी दल राजद ने तो आदतन राज्य सरकार की आलोचना की ही, लोकसभा चुनाव से पहले बिहार और उत्तर प्रदेश में अपनी मजबूत राजनीतिक जमीन बनाने की कोशिश में लगी भाजपा ने भी नीतीश कुमार सरकार को निशाना बनाने में कोई देरी नहीं की।

हमले की सच्चाई तो जांच से सामने आएगी ही, लेकिन ज्यादा जरूरी यह है कि हमारे नीति-नियंता इसे एक सबक की तरह लेते हुए सुरक्षा-व्यवस्था पर पर्याप्त ध्यान दें।

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