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लोकतंत्र का महायज्ञ
Updated Thu, 06 Mar 2014 08:51 PM IST
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देश का सियासी पारा तो पहले ही काफी गर्म हो चुका है, चुनाव आयोग की औपचारिक घोषणा के बाद उसमें और तेजी आएगी।
ये चुनाव पिछले चुनावों से सिर्फ इसलिए भिन्न नहीं हैं कि ये पारंपरिक तौर-तरीकों के बजाय तकनीक के कौशल से भी लड़े जा रहे हैं, या फिर पहली बार प्रधानमंत्री पद को मुद्दा बनाया जा रहा है; बल्कि इसलिए भी कि पार्टियों की नीतियों या विचारधारा से कहीं अधिक व्यक्तित्वों को मुद्दा बनाने की कोशिशें हो रही हैं।
भारतीय जनता पार्टी का पूरा प्रचार उसके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के इर्द-गिर्द है; जबकि अटल बिहारी वाजपेयी या लालकृष्ण आडवाणी की अगुवाई में लड़े गए पिछले चुनावों में भी पार्टी ने उनके व्यक्तित्वों को इतनी अहमियत नहीं दी थी।
दूसरी ओर सत्तारूढ़ कांग्रेस 1977 के बाद इतनी बेबस कभी नजर नहीं आई। वास्तव में उसकी हालत 1996 के चुनाव से भी खराब नजर आ रही है, जब उसे पहली बार गांधी परिवार के नेतृत्व के बिना उतरना पड़ा था।
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दस वर्ष तक प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह तो पार्टी का चेहरा बन ही नहीं पाए, सोनिया और राहुल की जोड़ी भी हताश पार्टी में जान फूंकने में नाकाम दिख रही है। सिर्फ संगठन की बात नहीं है, चुनाव से पहले नए सहयोगी तलाशना तो दूर, पुराने के साथ भी पार्टी निभा नहीं पा रही है।
ये चुनाव इसलिए भी अलग हैं, क्योंकि भ्रष्टाचार के खिलाफ नए आंदोलन से उपजी आम आदमी पार्टी उतार-चढ़ाव के बीच राजनीतिक पंडितों के लिए कौतुहल बनी हुई है। बेशक, तीसरे मोर्चे के किरदार कमोबेश वही लोग हैं, जिन्होंने अतीत में इसे अंजाम दिया, लेकिन
पारंपरिक रूप से इसका हिस्सा रहे कुछ लोग चुनाव के बाद के गणित का भी इंतजार कर रहे हैं। इन सबके बीच, लोकसभा चुनाव के खर्चीले होने के बारे में कोई बहस करने को तैयार नहीं है। दरअसल चुनावी खर्च के मामले में भी ये चुनाव सबसे महंगे साबित होने जा रहे हैं, जिसे शायद ही कोई चुनावी मुद्दा बनाए।
इसके बावजूद भारतीय लोकतंत्र की ताकत ने दुनिया के तमाम देशों को अचंभित किया है, जहां आम मतदाता किसी को भी सत्ता से बेदखल कर सकता है या सत्ता में बिठा सकता है, और इस बार यह ताकत 81 करोड़ लोगों के पास है, जिनमें से पांच करोड़ युवा तो पहली बार वोट डालेंगे।
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ये चुनाव पिछले चुनावों से सिर्फ इसलिए भिन्न नहीं हैं कि ये पारंपरिक तौर-तरीकों के बजाय तकनीक के कौशल से भी लड़े जा रहे हैं, या फिर पहली बार प्रधानमंत्री पद को मुद्दा बनाया जा रहा है; बल्कि इसलिए भी कि पार्टियों की नीतियों या विचारधारा से कहीं अधिक व्यक्तित्वों को मुद्दा बनाने की कोशिशें हो रही हैं।
भारतीय जनता पार्टी का पूरा प्रचार उसके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के इर्द-गिर्द है; जबकि अटल बिहारी वाजपेयी या लालकृष्ण आडवाणी की अगुवाई में लड़े गए पिछले चुनावों में भी पार्टी ने उनके व्यक्तित्वों को इतनी अहमियत नहीं दी थी।
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दूसरी ओर सत्तारूढ़ कांग्रेस 1977 के बाद इतनी बेबस कभी नजर नहीं आई। वास्तव में उसकी हालत 1996 के चुनाव से भी खराब नजर आ रही है, जब उसे पहली बार गांधी परिवार के नेतृत्व के बिना उतरना पड़ा था।
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दस वर्ष तक प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह तो पार्टी का चेहरा बन ही नहीं पाए, सोनिया और राहुल की जोड़ी भी हताश पार्टी में जान फूंकने में नाकाम दिख रही है। सिर्फ संगठन की बात नहीं है, चुनाव से पहले नए सहयोगी तलाशना तो दूर, पुराने के साथ भी पार्टी निभा नहीं पा रही है।
ये चुनाव इसलिए भी अलग हैं, क्योंकि भ्रष्टाचार के खिलाफ नए आंदोलन से उपजी आम आदमी पार्टी उतार-चढ़ाव के बीच राजनीतिक पंडितों के लिए कौतुहल बनी हुई है। बेशक, तीसरे मोर्चे के किरदार कमोबेश वही लोग हैं, जिन्होंने अतीत में इसे अंजाम दिया, लेकिन
पारंपरिक रूप से इसका हिस्सा रहे कुछ लोग चुनाव के बाद के गणित का भी इंतजार कर रहे हैं। इन सबके बीच, लोकसभा चुनाव के खर्चीले होने के बारे में कोई बहस करने को तैयार नहीं है। दरअसल चुनावी खर्च के मामले में भी ये चुनाव सबसे महंगे साबित होने जा रहे हैं, जिसे शायद ही कोई चुनावी मुद्दा बनाए।
इसके बावजूद भारतीय लोकतंत्र की ताकत ने दुनिया के तमाम देशों को अचंभित किया है, जहां आम मतदाता किसी को भी सत्ता से बेदखल कर सकता है या सत्ता में बिठा सकता है, और इस बार यह ताकत 81 करोड़ लोगों के पास है, जिनमें से पांच करोड़ युवा तो पहली बार वोट डालेंगे।