फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   Other Archives ›   degradation of Congress

कांग्रेस का क्षरण

Mon, 09 Dec 2013 07:22 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Mon, 09 Dec 2013 07:22 PM IST
विज्ञापन
degradation of Congress

जोरम में ललथनहवला की अगुवाई में कांग्रेस को मिली जीत सोनिया और राहुल गांधी के लिए सांत्वना पुरस्कार की तरह ही हैं, वरना दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के नतीजों ने पार्टी को पहले ही जमीन दिखा दी है।

विज्ञापन


यह बात दीवार पर लिखी इबारत की तरह साफ दिख रही है कि सवा सौ बरस पुरानी पार्टी लगातार सिमटती जा रही है, पर हैरत यह है कि वह कोई सबक लेने को तैयार ही नहीं है।
विज्ञापन


यह पराजय संगठन तथा नेतृत्व के साथ ही यूपीए की नीतियों और कांग्रेस की रणनीतियों की भी नाकामी का नतीजा है। हकीकत यह है कि पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी अब तक कोई करिश्मा नहीं कर पाए हैं, इसके बावजूद पार्टी के नेता विधानसभा चुनावों की पराजय को उनकी नाकामी से जोड़कर देखने को तैयार ही नहीं हैं। जबकि 2009 में यूपीए के सत्ता में आने के बाद से उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार और पश्चिम बंगाल से लेकर गुजरात और पंजाब तथा अभी हुए विधानसभा चुनावों तक में देखा जा सकता है कि राहुल आम मतदाताओं को संदेश देने में नाकाम साबित हुए हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


हिमाचल और उत्तराखंड जैसे कुछ अपवाद जरूर हैं; और ध्यान रहे कर्नाटक विधानसभा चुनाव में मतदाताओं ने भाजपा के भ्रष्टाचार को नकारा था। अभी हालत यह थी कि दिल्ली में राहुल की सभा से लोगों को उठकर जाते तक देखा गया! दूसरी ओर दस वर्षों से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आज भी आम मतदाताओं से सीधे संवाद करने की स्थिति में नहीं हैं।

यह उस पार्टी का हाल है, जिसे 2009 के लोकसभा चुनावों में उम्मीदों से अधिक सीटें मिली थीं। इसमें संशय नहीं कि पार्टी की इस दुर्गति में यूपीए के दूसरे कार्यकाल के दौरान उजागर हुए घोटालों का बड़ा योगदान है, जिस कारण कांग्रेस इतनी अलोकप्रिय हो चुकी है कि छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में उसकी मुफ्त चावल देने की पेशकश तक को लोगों ने नकार दिया।


विभिन्न प्रदेश कांग्रेस समितियों की गुटबाजी पार्टी का ऐसा सिरदर्द है, जिसे दूर ही नहीं किया जा रहा है। आखिर शीला दीक्षित ने भी संगठन पर ही ठीकरा फोड़ा है! ऐसे समय जब अगले आम चुनाव को छह महीने भी नहीं बचे हैं, मनमोहन, सोनिया और राहुल की तिकड़ी को यह मंथन जरूर करना चाहिए कि आखिर आम मतदाता कांग्रेस से दूर क्यों होता जा रहा है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed