विश्व चैंपियन की कुर्सी से बेदखल

नई दिल्ली Updated Sun, 24 Nov 2013 08:10 PM IST
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defeat of vishwanathan anand

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विश्वनाथन आनंद की विश्व शतरंज चैंपियनशिप में हार उस देश के लिए बड़ा झटका है, जिसने हाल ही में सचिन तेंदुलकर को क्रिकेट से भावभीनी विदाई लेते देखा है। सचिन की तरह आनंद ने हालांकि खेल को अलविदा नहीं कहा है। लेकिन पांच साल तक लगातार विश्व चैंपियन रहे शख्स का अपनी जमीन पर एक भी मैच जीते बगैर टूर्नामेंट गंवा देना बताता है कि उम्र और समय संभवतः अब उसके पक्ष में नहीं है।
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शतरंज की बिसात पर उनकी चाल में वह तेजी नहीं है, न ही उनकी व्यूह रचना में अब पहले जैसी महारत है। पिछले कुछ वर्षों से मैग्नस कार्लसन जिस तेजी से उभरते दिखाई पड़े हैं, उसमें बढ़ती उम्र के विश्वनाथन आनंद के लिए विश्व चैंपियन की कुर्सी पर बने रहना संभव था भी नहीं।
हर खेल में उम्र और समय का महत्व होता है, फिर यह तो एक ऐसा खेल है, जिसमें प्रत्येक क्षण ऊर्जा और रणनीतिक चतुरता की जरूरत होती है। देश के इस सबसे कम उम्र ग्रैंडमास्टर ने जब लगातार उपलब्धियां अपने खाते में दर्ज करनी शुरू की थीं, ठीक तभी कई खिलाड़ी उनके पीछे-पीछे उभर रहे थे। उनमें से कोई भले प्रतिभा-क्षमता में उनके समकक्ष नहीं पहुंच पाया, पर अब तक अकेले विश्वनाथन आनंद विश्व शतरंज की कद्दावर शख्सियत बने रहे।
छह बार शतरंज का ऑस्कर जीतने वाले आनंद टूर्नामेंट, मैच, नॉकआउट और रैपिड की विश्व चैंपियनशिप-यानी शतरंज के सभी फॉर्मेट का खिताब जीतने वाले अकेले खिलाड़ी हैं। विश्व शतरंज में उन्होंने अगर रूस के दबदबे को खत्म किया, तो देश में शतरंज के प्रति उत्साहजनक माहौल बनाया। गुजरात और तमिलनाडु जैसे राज्यों के स्कूलों में शतरंज को अनिवार्य कर दिया गया है, तो यह उन्हीं के प्रयासों का फल है।

महज अट्ठारह की उम्र में पद्मश्री पाने वाले और राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित होने वाले पहले खिलाड़ी आनंद को पद्मविभूषण पहले ही मिल चुका है। जो लोग विश्वनाथन आनंद को नजदीक से जानते हैं, उनका विश्वास है कि अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। लेकिन भविष्य में वह सफलता की उस चोटी पर दोबारा नहीं पहुंचते हैं, तो भी बहुत अफसोस इसलिए नहीं होगा कि उन्होंने शतरंज में भारत को इतना कुछ दिया है, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी।
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