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पारी समाप्ति की घोषणा
Updated Fri, 03 Jan 2014 07:42 PM IST
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डॉ मनमोहन सिंह ने स्पष्ट कर दिया है कि अगले आम चुनाव में यूपीए की ओर से वह प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं होंगे। यह उनका व्यक्तिगत फैसला है या पार्टी का, यह उन्होंने स्पष्ट नहीं किया है, लेकिन इसका साफ मतलब है कि कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने की औपचारिकता जल्द पूरी हो सकती है। इसे एक तरह से कांग्रेस में मनमोहन युग का अंत भी कहा जा सकता है।
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निश्चय ही इतिहास, जैसा कि खुद मनमोहन सिंह ने कहा है, उनके साढ़े नौ वर्ष के कार्यकाल की विवेचना करेगा, लेकिन वह देश को आश्वस्त नहीं कर पाए कि आखिर क्यों उनकी सरकार महंगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी जैसे अहम मुद्दों को सुलझाने में नाकाम साबित हुई। ये वे मुद्दे हैं, जिन्हें अपनी बहुचर्चित और बहुप्रतीक्षित प्रेस कांफ्रेंस में मनमोहन सिंह ने अपनी नाकामी के तौर पर गिनाया है।
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2 जी स्पेक्ट्रम और कोयला घोटाले को लेकर मनमोहन सिंह ने जो तर्क दिए, उनसे तो ऐसा लगता है कि भ्रष्टाचार कोई मुद्दा ही नहीं है। यही नहीं, वह माओवाद को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताते रहे हैं, मगर उन्होंने आदिवासियों से जुड़े इस अहम मसले का जिक्र तक नहीं किया! इसके उलट मनमोहन सिंह ने भारत- अमेरिकी परमाणु करार को सबसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर दर्ज किया है, लेकिन यह हकीकत है कि आठ वर्षों के बीत जाने के बावजूद जमीनी स्तर पर यह समझौता कहीं नजर नहीं आ रहा है।
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अपनी विनम्र छवि के विपरीत भाजपा के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी पर तीखे हमले कर मनमोहन सिंह ने जरूर आगामी लोकसभा चुनाव की दिशा तय कर दी है। मगर राहुल गांधी के लिए वह जो विरासत छोड़ रहे हैं, उसमें बहुत उम्मीद बनती नहीं दिख रही है।
दरअसल उनका दूसरा कार्यकाल आर्थिक मोरचे पर नाकामियों और नीतिगत जड़ता की भेंट चढ़ गया, जिसे लेकर अंतरराष्ट्रीय साख एजेंसियों तक ने कई बार भारत की रेटिंग भी गिराई। कांग्रेस के लिए यह चिंता का कारण होना चाहिए कि मनमोहन सिंह के कार्यकाल में यूपीए का कुनबा भी लगातार बिखरता गया है। बेशक, वह इस बात पर संतोष कर सकते हैं कि अगले कुछ महीनों में होने वाले लोकसभा चुनाव के बाद, जब वह पद से हटेंगे, तब उनका नाम पंडित जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद सबसे लंबी अवधि तक प्रधानमंत्री पद पर रहने वाले शख्स के रूप में दर्ज हो जाएगा।