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तेलंगाना पर टकराव

Wed, 05 Feb 2014 08:13 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Wed, 05 Feb 2014 08:13 PM IST
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debate on telangana

संसद के इस आखिरी सत्र में यदि आंध्र प्रदेश के पुनर्गठन से संबंधित विधेयक पारित नहीं हो पाया, तो आगामी लोकसभा चुनाव से पहले तेलंगाना का गठन मुश्किल हो जाएगा। मगर दिक्कत यह है कि लोकसभा चुनाव और उसके साथ ही प्रस्तावित राज्य विधानसभा चुनाव के कारण तमाम सियासी दल अपने चुनावी नफे-नुकसान के हिसाब से इस मुद्दे को देख रहे हैं।

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खुद मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी आंध्र के विभाजन के खिलाफ अपनी लड़ाई को दिल्ली तक ले आए हैं। आंध्र प्रदेश की विधानसभा ने राज्य पुनर्गठन विधेयक को न केवल खारिज कर दिया है, बल्कि उस पर नौ हजार से अधिक संशोधन भी सुझा दिए हैं! मगर यूपीए सरकार इसे किसी भी तरह पारित करवाना चाहती है, संभवतः इसलिए ताकि तेलंगाना के गठन से कम से कम उसे इस नए राज्य से आगामी लोकसभा चुनाव में कुछ मदद मिल सके; सीमांध्र में तो वह अपना दांव पहले ही हार चुकी है।
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दूसरी ओर प्रमुख विपक्षी दल भाजपा के ताजा रुख को देखकर लगता नहीं कि वह सरकार को तेलंगाना के गठन का श्रेय लेने देगी। वाकई आंध्र प्रदेश की आज जो स्थिति हो गई है, वह परेशान करने वाली है। आंध्र प्रदेश के विभाजन के ऐलान के बाद से उसके पक्ष और विपक्ष में हुए उग्र आंदोलनों की वजह से काफी आर्थिक नुकसान हो चुका है। इसके अलावा पिछले तीन-चार महीने से वहां सारे काम मानो ठप पड़े हैं।
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तेलंगाना और सीमांध्र के बीच दरअसल सबसे बड़ा झगड़ा हैदराबाद को लेकर है। केंद्र ने जो प्रावधान किया है, उसके मुताबिक हैदराबाद दस वर्ष तक साझा राजधानी रहेगी और तब तक सीमांध्र के लिए नई राजधानी बना ली जाएगी। देर करने के बजाय सीमांध्र की राजधानी की घोषणा जल्दी होनी चाहिए।


वहां विशाखापट्टनम, कुरनुल या तिरुपति जैसे कई शहर हैं, जिसे राजधानी बनाया जा सकता है। सीमांध्र के लोगों को भी समझना चाहिए कि नई राजधानी मिलने से निवेश के नए रास्ते बनेंगे। उनके सामने पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ का उदाहरण है, जिसकी राजधानी रायपुर निवेश का नया केंद्र बन चुकी है। अच्छा होगा कि केंद्र सरकार इस विधेयक को संसद में रखने से पहले सभी पक्षों को विश्वास में लेने का प्रयास करे और उन प्रमुख संशोधनों पर जरूर गौर करे, जिन पर सीमांध्र के लोगों को आपत्ति है।

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