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दो ध्रुवों पर खड़े दो महारथी
नई दिल्ली
Updated Fri, 26 Jul 2013 08:27 PM IST
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राष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी के आगमन के साथ ही कांग्रेस और भाजपा के बीच चल रही तीखी बहस को दो दिग्गज अर्थशास्त्रियों अमर्त्य सेन तथा जगदीश भगवती के बीच आर्थिक नीतियों और विकास के मॉडल को लेकर छिड़ी बहस ने जाने-अनजाने और तेज कर दिया है।
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हालांकि राजनीतिक तकरार में इन दोनों अर्थशास्त्रियों को घसीटना ठीक नहीं है, लेकिन हाल में आए उनके बयानों और टिप्पणियों से ऐसा आभास होने लगा, मानो यह बहस सेन बनाम भगवती न होकर मोदी बनाम गांधी (सोनिया-राहुल) हो गई है!
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ये दोनों अर्थशास्त्री एक दूसरे की मान्यताओं को खारिज करते रहे हैं और मोटे तौर पर सेन को कल्याणकारी नीतियों का और भगवती को बाजार का समर्थक माना जाता है। इसके अलावा उन दोनों में एक बड़ा फर्क यह है कि जहां सेन यह मानते हैं कि सिर्फ आर्थिक विकास दर विकास का पैमाना नहीं हो सकती, उसके साथ मानव विकास भी जरूरी है; वहीं भगवती का तर्क है कि आर्थिक विकास होने से ही मानव विकास संभव हो सकेगा।
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उनकी यह बहस मोदी के गुजरात मॉडल तक चली गई है, सेन जिसे पूरी तरह खारिज करते हैं और उसे समावेशी नहीं मानते, तो भगवती उसकी वकालत करते हैं और उसे सामाजिक सूचकांकों पर भी खरा बता रहे हैं। इससे हुआ यह कि अमर्त्य सेन को कांग्रेस समर्थक और जगदीश भगवती को मोदी समर्थक मान लिया गया है, जबकि ऐसा कतई नहीं है।
खुद भगवती साफ कर चुके हैं कि उनका न तो नरेंद्र मोदी और न ही राहुल गांधी के प्रति किसी तरह का अनुराग है और यह सबको पता है कि सेन ने भले ही खाद्य सुरक्षा कानून का समर्थन किया है, मगर वह मनमोहन सरकार की आर्थिक नीतियों से बहुत इत्तफाक नहीं रखते। दिलचस्प यह है कि सेन और भगवती के बहाने आज भले ही कांग्रेस और भाजपा आपस में भिड़ रही हैं, लेकिन इन दोनों पार्टियों की आर्थिक नीतियों में कोई खास फर्क नहीं है, दोनों ही उदारीकरण और निजी निवेश की समर्थक हैं।
हमारे समय के दो शीर्ष अर्थशास्त्रियों के बीच चल रही इस बहस के चाहे जो भी राजनीतिक अर्थ निकाले जाएं, अहम यह है कि क्या इससे देश की अर्थनीति को कोई दिशा मिलेगी? यह सवाल खासकर इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश आज जिन आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है, आठ महीने बाद बनने वाली नई सरकार के सामने वही चुनौतियां कहीं अधिक भयावह रूप में सामने आ सकती हैं।