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पटरियों पर मौत

Thu, 06 Aug 2015 07:30 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 06 Aug 2015 07:30 PM IST
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Death on rail track

मध्य प्रदेश के हरदा के नजदीक कुछ ही मिनटों के अंतराल में एक ही पुलिया के पास हुए ट्रेन हादसों से यही पता चलता है कि रेलवे का बुनियादी ढांचा भीतर से कितना जर्जर हो चुका है। मध्य प्रदेश में खासतौर से जहां पर ये हादसे हुए, वहां पिछले कुछ दिनों में भारी बारिश हुई है, जिसकी वजह से काली माचक नदी उफान पर थी, जिस पर बनी पुलिया के पास पानी पटरियों के ऊपर बहने लगा। अपनी तरह के इस अनूठे हादसे की भयावहता इससे पता चलती है कि रेल लाइन पर कई किलोमीटर दूर तक यात्रियों के शव मिले हैं। संभव है कि जो लोग उफनती नदी में बह गए हों, उनमें से कई के बारे में शायद कभी पता भी न चले।

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रेल मंत्री सुरेश प्रभु के मुताबिक बाढ़ की वजह से पटरियों का कुछ हिस्सा बह गया, जिसके कारण कामायनी एक्सप्रेस और जनता एक्सप्रेस के कुछ डिब्बे दुर्घटनाग्रस्त हो गए। लेकिन इस हादसे के लिए, जिसमें 25 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और नुकसान का अभी ठीक से अंदाजा तक नहीं लगाया जा सका है, सिर्फ बारिश और बाढ़ को दोष देना सिवाय भोलेपन के और क्या है! रेलवे बोर्ड के चेयरमैन का यह बयान भी बचकाना लगता है कि हादसे से कुछ मिनट पहले ही दो ट्रेनें इस रेल लाइन से गुजरी थीं, लिहाजा इसके लिए रेलवे को दोषी नहीं माना जा सकता। यदि पटरियां बह गई थीं, तो इसका मतलब है कि तेज बारिश के कारण रेल ट्रैक कमजोर पड़ गया था, और जाहिर है, यह एक दिन में नहीं हुआ होगा।
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सवाल है कि ट्रेन की पटरियों के रख-रखाव की जिम्मेदारी किसकी है? सच तो यह है कि देश के 65,000 किलोमीटर लंबे रेलवे नेटवर्क के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की जरूरत है। अब भी न जाने कितनी ट्रेनें सौ वर्ष से भी अधिक पुराने पुलों या पुलियों के ऊपर से गुजरती हैं। लेवल क्रॉसिंग की समस्या अपनी जगह कायम है, जिस पर हर बजट में बात होती है। ऐसा नहीं है कि रेलवे की दशा सुधारने के लिए प्रयास नहीं किए गए हैं। राकेश मोहन, अनिल काकोदकर, सैम पित्रोदा और ई श्रीधरन जैसे विद्वान-विशेषज्ञों की अगुआई में अनेक कमेटियां न जाने कितने सुझाव दे चुकी हैं। यदि उनमें से आधे पर भी अमल हो जाए, तो भी रेलवे और रेल यात्रियों का भला हो जाएगा।
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