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एक शिक्षक का जाना

Tue, 28 Jul 2015 08:28 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Tue, 28 Jul 2015 08:28 PM IST
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Death of a 'teacher'

एपीजे अब्दुल कलाम ने एकाधिक बार कहा था कि वह चाहते हैं कि उन्हें शिक्षक के रूप में याद किया जाए। और शायद नियति को भी यही मंजूर था कि उन्होंने शिलांग में विद्यार्थियों के बीच ही अंतिम सांस ली। राष्ट्रपति के अपने कार्यकाल के दौरान ही नहीं, बल्कि सेवानिवृत्त होने के बाद भी विद्यार्थियों से उनका संवाद निरंतर बना रहा। हालांकि यह उनके विराट व्यक्तित्व का एक पहलू है, सही मायने में उन्होंने राष्ट्रपति पद के मायने ही बदल दिए थे।

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2002 में राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने न केवल बहुत-सी पुरानी मान्यताओं को बदला, बल्कि आम लोगों से सीधे जुड़ने से कभी गुरेज नहीं किया और ऐसा करते हुए वह प्रोटोकॉल वगैरह को भी दरकिनार कर देते थे। तमिलनाडु के रामेश्वरम के एक साधारण मछुआरा परिवार में जन्मे कलाम ने स्वतंत्रता मिलने के तुरंत बाद का वह दौर देखा था, जब देश अभावों और गरीबी से जूझ रहा था। शायद यही वजह है कि उन्होंने खुद को कभी आम लोगों से अलग नहीं माना। वह अध्यात्म और विज्ञान का अद्भुत संगम थे। निश्चय ही, मई 1998 में दूसरी बार परमाणु परीक्षण करने का निर्णय तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार का था, लेकिन भूलना नहीं चाहिए कि इसके मुख्य परियोजना समन्वयक कलाम ही थे!
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इस संत वैज्ञानिक की अगुआई में हुआ यह परीक्षण इस बात की तस्दीक करता था कि भारत का परमाणु कार्यक्रम शांति के लिए है। यह उपलब्धि एक वैज्ञानिक के रूप में उनके करियर का शिखर भले हो, लेकिन 1980 में उनकी अगुआई में रोहिणी उपग्रह के प्रक्षेपण ने देश के अंतरिक्ष विज्ञान की दिशा ही बदल दी। रोहिणी के सफल प्रक्षेपण ने भारत को उन चुनींदा देशों की कतार में खड़ा कर दिया, जो अपने प्रक्षेपण यान से उपग्रह अंतिरक्ष में भेज सकते हैं। इस अंतरिक्ष विज्ञानी का कहना था कि सपने वे नहीं हैं, जो नींद में देखे जाते हैं, सपने वे हैं जो आपको सोने न दें! उन्होंने 2020 तक भारत को एक समृद्ध, मजबूत और आत्मनिर्भर राष्ट्र बनाने का सपना देखा था, जिसके लिए वह निरंतर युवाओं को प्रेरित करते रहते थे। इस शिक्षक को सच्ची श्रद्धांजलि तो यही होगी कि हम उनके इस सपने को संकल्प में बदल दें।

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