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एक जमीनी नेता का जाना

Tue, 03 Jun 2014 09:04 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Tue, 03 Jun 2014 09:04 PM IST
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death of a mass leader

केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री गोपीनाथ मुंडे की मौत से देश ने किसानों के साथ ही वंचित तबके के लोगों की आवाज उठाने वाला एक जमीनी नेता खो दिया है। मुंडे उन विरले नेताओं में से थे, जिनका जीवंत संपर्क निचले स्तर तक बना हुआ था और अभी लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की अगुआई में भाजपा को मिली ऐतिहासिक जीत से पहले तक वह किसानों के मुद्दे उठाते देखे जा सकते थे।

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यह विडंबना ही है कि ऐसे समय जब उन्हें ग्रामीण विकास, खासतौर से किसानों और खेतिहर मजदूरों के लिए काम करने का मौका मिला था, सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई। प्रधानमंत्री मोदी ने मंत्रिमंडल का आकार छोटा रखने के लिए कई मंत्रालयों को आपस में मिलाया है। उसी के तहत पेयजल और स्वच्छता तथा पंचायती राज मंत्रालयों को भी ग्रामीण विकास मंत्रालय के अधीन किया गया है; मुंडे की क्षमता, योग्यता और अनुभव के लिहाज से देखें, तो उन्हें इस मंत्रालय की जिम्मेदारी देने का फैसला बिल्कुल ठीक कदम था।
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वह खासतौर से महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी ऐक्ट (मनरेगा) की विसंगतियों और इसकी आड़ में पनप रहे भ्रष्टाचार को दूर करना चाहते थे और सुनिश्चित करना चाहते थे कि मनरेगा के कारण खेती प्रभावित न हो और कामगारों को समय पर भुगतान हो। बेशक, यह मोदी लहर का असर था कि महाराष्ट्र में भी इस बार लोकसभा चुनाव में भाजपा-शिवसेना की युति ने 48 में से 42 सीटें जीत लीं, लेकिन तकरीबन दो दशक से जारी इस गठबंधन को मजबूत बनाए रखने में दिवंगत भाजपा नेता प्रमोद महाजन के साथ ही मुंडे की अहम भूमिका थी।
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वास्तव में महाजन की असमय मौत के बाद महाराष्ट्र भाजपा की राजनीति में मुंडे थोड़ा कमजोर जरूर पड़ने लगे थे, लेकिन जमीनी आधार होने के कारण उन्हें नजरंदाज नहीं किया जा सकता था। हकीकत यह है कि तकरीबन डेढ़ दशक से महाराष्ट्र की सत्ता से बेदखल भाजपा-शिवसेना गठबंधन के लिए इसी वर्ष के अंत तक होने वाले विधानसभा चुनावों में अच्छी संभावनाएं जताई जा रही हैं और मुंडे को मुख्यमंत्री पद के मजबूत दावेदार के तौर पर भी देखा जा रहा था। गोपीनाथ मुंडे की मौत मोदी सरकार के लिए तो बड़ी क्षति है ही, उनके जाने से महाराष्ट्र की राजनीति में भी एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है।

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