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शिखर पर बेटियां

अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sun, 05 Jul 2015 08:04 PM IST
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Daughters on Top
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सिविल सेवा में लड़कियां इससे पहले भी टॉपर बनी हैं, लेकिन पहली बार शीर्ष चार स्थानों पर कब्जा जमाकर बेटियों ने जता दिया है कि अगर उन्हें मौका मिले, तो देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा में भी सामूहिक रूप से अपनी श्रेष्ठता का डंका बजाना उनके लिए कोई मुश्किल काम नहीं है। आखिर सीबीएसई की दसवीं और बारहवीं की परीक्षाओं में बेटियां निरंतर आगे निकल ही रही हैं।
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इस देश में अब उपलब्धि का शायद ही ऐसा कोई शिखर बचा है, जिसे लड़कियां न छू पाई हों। इसके बावजूद 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' और 'सेल्फी विद डॉटर' जैसे प्रेरणास्पद कार्यक्रमों के इस दौर में इरा सिंघल, रेणु राज, निधि गुप्ता और वंदना राव की सामूहिक उपलब्धियों का मतलब है। साफ है कि अगर बेटियों को बोझ न माना जाए, और उनके सपनों को हकीकत में बदलने के लिए उनका साथ दिया जाए, तो कोई भी मुश्किल उनका रास्ता नहीं रोक सकती। छठे प्रयास में टॉप करने वाली शारीरिक रूप से निशक्त इरा सिंघल से बड़ा उदाहरण इस मामले में दूसरा नहीं हो सकता। सिविल सेवा में लगातार सफल होने के बावजूद इरा की नियुक्ति में जब उसकी शारीरिक निशक्तता बाधा बनकर आई, तो उन्होंने कैट में इसे चुनौती दी। कैट का फैसला अपने पक्ष में आने के बाद वह आईआरएस की ट्रेनिंग कर रही थीं कि इस बार वह सिविल सेवा परीक्षा में प्रथम आई हैं। इरा की यह उपलब्धि देश की तमाम बेटियों के लिए मिसाल है कि न लड़की होना किसी काम में बाधक है, न ही शारीरिक रूप से निशक्त होना।


शेष बेटियों की सफलता की कहानी भी कमोबेश एक समान है। पहली बार में ही दूसरी रैंकिंग हासिल करने वाली रेणु राज को छोड़ दें, तो ज्यादातर में शुरुआत से ही आईएएस बनने की अभिलाषा थी और प्रारंभिक विफलताओं के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। दिल्ली की इन लड़कियों के अलावा दूर-दराज के कई प्रतिभागियों की सफलता भी उनकी लगन की तसदीक करती है। मसलन, सातवीं रैंक हासिल करने वाले जींद के लोकबंधु की दो बड़ी बहनें भी आईएएस हैं, तो मेरठ के निशांत जैन ने हिंदी माध्यम से पढ़ाई करके सातवीं रैंकिंग हासिल की है। उनका कहना है कि अगर मन से पढ़ाई की जाए, तो हिंदी माध्यम बाधक नहीं है। सिविल सेवा में ये उपलब्धियां आखिर बाधाओं को पार कर ही तो हासिल की गई हैं।
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