{"_id":"710365b8f9f34296c1fd0f3e86704871","slug":"dangerous-intentions","type":"story","status":"publish","title_hn":"खतरनाक इरादे","category":{"title":"Other Archives","title_hn":"अन्य आर्काइव","slug":"other-archives"}}
खतरनाक इरादे
नई दिल्ली
Updated Sun, 02 Mar 2014 07:41 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
यूक्रेन में रूस समर्थक राष्ट्रपति विक्टर यांकोविच को हटा देने के बाद शांति और स्थिरता लौटने की जो उम्मीद की जा रही थी, वह क्षीण ही साबित हुई। अस्थिरता के बीच रूसी नागरिकों की सुरक्षा का तर्क देकर पुतिन ने वहां सेना भेजने के प्रस्ताव को संसद से जिस तरह पारित कराया, और यूक्रेन ने अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए जवाबी सैन्य तैयारी का संकेत देने के अलावा पश्चिमी देशों से जो मदद मांगी है, वह भयावह भविष्य का संकेत देता है।
विज्ञापन
उस क्रीमिया में तो रूसी सेना ने अपने आक्रामक इरादे जाहिर भी कर दिए हैं, जहां रूसी नागरिकों की बड़ी आबादी है। यूक्रेन की सुरक्षा के लिए पश्चिमी देश वचनबद्ध हैं; अमेरिकी राष्ट्रपति ने यूक्रेन पर हमला होने की स्थिति में रूस को कीमत चुकाने की जो चेतावनी दी है, वह इस ओर संकेत भी करती है। वहां दशकों बाद शीतयुद्धकालीन दौर की वापसी की जो आशंका बन रही है, इसके लिए रूस का रवैया ही जिम्मेदार है।
विज्ञापन
हैरत तो इस बात पर है कि ओबामा की चेतावनी की प्रतिक्रिया में मास्को ने वाशिंगटन स्थित अपने राजदूत को वापस बुलाने का भी फैसला किया है। दरअसल पूर्व सोवियत संघ का हिस्सा रहे देश अब रूस से अलग पहचान बनाना चाहते हैं, यूक्रेन जैसे देश यूरोपीय संघ से जुड़ने को इच्छुक हैं। कायदे से पुतिन को इस पर आपत्ति नहीं होनी चाहिए, क्योंकि ये सभी स्वतंत्र राष्ट्र हैं। लेकिन पुतिन के इरादे कुछ और ही हैं। पूर्व सोवियत संघ का हिस्सा रहे इन देशों में रहने वाले रूसी लोग भी जब-तब पुतिन की मंशा को हवा देते रहते हैं।
विज्ञापन
ऐसे में रूसी नागरिकों की सुरक्षा का तर्क पुतिन के वर्चस्ववादी तौर-तरीके का कवच बन जाता है। वर्ष 2008 में जॉर्जिया में ठीक इसी तरह के अलगाववादी माहौल का फायदा उठाते हुए रूस ने दक्षिण ओसेतिया पर कब्जा कर लिया था। लिथुआनिया पर रूसी दखल का मुद्दा संयुक्त राष्ट्र में है ही। अब रूस उस क्रीमिया पर कब्जा करना चाहता है, जो 1954 से यूक्रेन का हिस्सा है। इस बीच फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देश रूस को संयम बरतने की सलाह दे रहे हैं और संयुक्त राष्ट्र भी सक्रिय हो गया है। युद्ध जैसी स्थिति न आए, इसके लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को हरसंभव कोशिश करनी ही होगी।