व्यक्तिगत संबंधों की कसौटी

नई दिल्‍ली Updated Mon, 08 Oct 2012 09:47 PM IST
Criterion of personal relationships
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा और रियल एस्टेट क्षेत्र की दिग्गज कंपनी डीएलएफ के व्यावसायिक रिश्तों को लेकर उठे विवाद पर जिस तरह से वरिष्ठ मंत्री और यूपीए के घटक दल सामने आए हैं, उससे साफ है कि यह दो व्यक्तियों या दो कंपनियों के बीच का निजी मामला नहीं है। हो सकता है कि रॉबर्ट वाड्रा के साथ डीएलएफ का वित्तीय लेनदेन कानूनों के दायरे में हो और उनकी बैलेंस सीट आयकर कानूनों का उल्लंघन न कर रही हो; मगर लाख टके का सवाल है कि रियल एस्टेट कंपनी ने सिर्फ उन्हीं पर ऐसी मेहरबानी क्यों की? उन्हें उदार ऋण और रियायतें देने की वजह क्या है? इन दोनों के व्यावसायिक हित दिल्ली, राजस्थान और हरियाणा तक फैले हुए हैं, जहां कांग्रेस की सरकारें हैं। ऐसे में अरविंद केजरीवाल और उनके वकील साथी प्रशांत भूषण के आरोपों को सिर्फ यह कहकर खारिज नहीं किया जा सकता कि वे अपनी राजनीतिक पार्टी के पक्ष में सस्ती लोकप्रियता अर्जित करने का प्रयास कर रहे हैं।

असल में संदेह इसलिए भी हो रहा है, क्योंकि 2007 के बाद से कुछ वर्षों के भीतर ही रॉबर्ट वाड्रा की अचल संपत्ति और निवेश में अप्रत्याशित वृद्धि देखी गई है। नहीं भूलना चाहिए कि महज चार-पांच वर्षों में ही वाड्रा की करीब आधा दर्जन कंपनियां अस्तित्व में आई हैं। उन पर उंगली उठने की सबसे बड़ी वजह यह है कि वह कांग्रेस अध्यक्ष के दामाद हैं, इसीलिए जरूरी है कि वह नैतिकता की कसौटी पर खरे उतरें। उनका बचाव करना कांग्रेस और सरकार की मजबूरी हो सकती है, क्योंकि इसका सीधा असर पार्टी की भावी चुनावी संभावनाओं पर पड़ सकता है।

मगर, इस मामले में भाजपा का रवैया हैरान करने वाला है। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उसका दोमुंहापन पहले ही उजागर हो चुका है और इस मामले में वह रस्म अदायगी करती दिख रही है। संभवतः उसे यह भय भी सता रहा हो कि केजरीवाल ऐंड कंपनी की लिस्ट में कहीं उसके अपने नेताओं का नाम न हो। बहरहाल, यहां यह रेखांकित करना जरूरी लग रहा है कि यूपीए के आठ वर्ष के शासन में खुद सोनिया गांधी की व्यक्तिगत नैतिकता पर कोई सवाल नहीं उठा है और न ही उनके पुत्र और कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के किसी तरह के व्यावसायिक हित सामने आए हैं। यह बात तो खुद रॉबर्ट वाड्रा भी जानते होंगे।

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