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पश्चिम एशिया का संकट

Thu, 07 Jan 2016 01:43 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 07 Jan 2016 01:43 PM IST
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Crisis of West Asia

शिया धर्मगुरु निम्र अल निम्र समेत अन्य अनेक लोगों को सऊदी अरब में सजा-ए-मौत देने की प्रतिक्रिया में ईरान में उठा बवंडर अब सिर्फ इन्हीं दो देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि पश्चिम एशिया से लेकर पूरी दुनिया तक इसका कमोबेश असर देखा जा रहा है। रियाद की आक्रामकता के जवाब में ईरान में लोग जिस तरह सड़कों पर उतर आए और सऊदी दूतावास में आग लगा दी, उसने खाड़ी के अनेक देशों को सऊदी अरब के पक्ष में खड़ा भले कर दिया हो, पर किंग सलमान के सत्ता संभालने के बाद से वह मुल्क आक्रामकता का जैसा परिचय दे रहा है, वह भी उतना ही चिंताजनक है।

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सऊदी अरब के इस रवैये को दरअसल उसकी दोहरी हताशा का सुबूत बताया जा रहा है; वहाबी इस्लाम के प्रसार के कारण वह उदार विश्व के निशाने पर तो है ही, तिस पर अमेरिका के लिए पहले जैसा महत्वपूर्ण न रह पाने का क्षोभ भी उसकी आक्रामक रणनीति में दिखाई देता है। अमेरिका समेत छह महाशक्तियों द्वारा वर्षों बाद ईरान के साथ की गई परमाणु संधि ने जिन दो देशों को सर्वाधिक क्षुब्ध किया, वे इस्राइल और सऊदी अरब ही थे। ईरान और सऊदी अरब हालांकि सीरिया, अमन और लेबनान में एक दूसरे के खिलाफ ही थे, पर अमेरिका समेत पश्चिमी शक्तियां उन्हें संतुलित बनाए हुई थीं।
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पर रियाद को अब लग रहा था कि अमेरिका उसके बजाय ईरान का पक्ष लेने लगा है। इसी का नतीजा सऊदी अरब में शिया धर्मगुरु को मृत्युदंड देने के तौर पर सामने आया, जिस कारण शिया-सुन्नी के बीच की लड़ाई अब ज्यादा हिंसक और खुले तौर पर सामने आ गई है। ईरान और सऊदी अरब ने राजनयिक रिश्ते बेशक खत्म कर दिए हैं, पर इससे आगे वे शायद ही जाएंगे। लेकिन सीरिया और यमन में राजनयिक सफलता की जो झीनी-सी उम्मीद पैदा हुई थी, मौजूदा संकट से वह फिलहाल खत्म हो गई है। यही नहीं, अमेरिका और ईरान के साथ आने से आईएस पर नकेल कसे जाने की जो आशा बंधी थी, अब उस पर भी फिलहाल विराम लगता दिख रहा है। यह विवाद लंबे समय से तलहटी में पड़े कच्चे तेल की कीमत में उफान ला दे, तो आश्चर्य नहीं। लिहाजा अमेरिका, रूस, चीन और यूरोपीय संघ इसके समाधान की दिशा में जितनी जल्दी पहल करते हैं, उतना ही अच्छा होगा।
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