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क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया का संकट

Tue, 12 Mar 2013 09:26 PM IST
Updated Tue, 12 Mar 2013 09:26 PM IST
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crisis of cricket australia

पराजय किस तरह दिग्गजों तक का मनोबल तोड़ देती है, यह टीम ऑस्ट्रेलिया द्वारा अपने चार खिलाड़ियों के खिलाफ कथित अनुशासनात्मक कार्रवाई से समझा जा सकता है। खिलाड़ियों द्वारा समय पर सुझाव न देने की इतनी बड़ी सजा क्रिकेट इतिहास में अभूतपूर्व तो है ही, यह कदम उठाकर कोच मिक आर्थर ने सीरीज में टीम की वापसी की रही-सही संभावना का भी गला घोंट दिया है।

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प्रबंधन ने यह भी नहीं सोचा कि मोहाली की अपेक्षाकृत तेज पिच खासकर जेम्स पेंटिसन के लिए मददगार साबित हो सकती है। बल्कि उप कप्तान शेन वाटसन ने अपना आखिरी शतक भी दो साल पहले मोहाली में ही लगाया था! इसमें शक नहीं कि वाटसन का प्रदर्शन ही नहीं, कप्तान के साथ रिश्ता भी हताश करने वाला रहा है। वह लगातार चोटग्रस्त तो रहे ही, पिछले दो वर्षों में उनका बल्लेबाजी औसत 25 से थोड़ा ही ऊपर है। मानो यही काफी न हो, ओपनिंग करने की मांग न माने जाने के कारण वह कप्तान और प्रबंधन से नाराज थे।
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क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया के एक वरिष्ठ पदाधिकारी पैट होवार्ड ने टीम को शत-प्रतिशत न देने के कारण उनकी जैसी आलोचना की है, और उस पर संन्यास तक की धमकी दे चुके वाटसन ने जैसी गुस्सैल प्रतिक्रिया जताई है, वे यह जताने के लिए काफी है कि संक्रमण काल से गुजर रही टीम ऑस्ट्रेलिया का संकट बड़ा है। इसके बावजूद प्रबंधन के इस फैसले का समर्थन नहीं किया जा सकता, क्योंकि चुनौतियों के समय जब उससे धैर्य और पेशेवराना रवैये की उम्मीद की जा रही थी, तब उसने ऐसा निर्णय लिया, जो उसकी हताशा ही व्यक्त करता है।
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अगर वाटसन से प्रबंधन नाराज था, तब भी शेष तीन खिलाड़ियों को सिर्फ सुझाव न देने के कारण सजा देने का कोई औचित्य नहीं है। अब उसके सामने उपलब्ध तेरह खिलाड़ियों से ही तीसरे टेस्ट की टीम चुनने की विवशता तो है ही, एशेज जैसी महत्वपूर्ण सीरीज से पहले इस तरह का फैसला टीम का मनोबल तोड़ने का ही काम करेगा। बल्कि कहा तो यह भी जा रहा है कि सीरीज गंवाने की स्थिति में जिम्मेदारी से मुक्त कर दिए जाने के डर ने ही क्रिकेट विश्व में अल्पज्ञात मौजूदा ऑस्ट्रेलियाई कोच को यह अतिवादी कदम उठाने के लिए विवश किया।

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