फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   Other Archives ›   crisis of congress

कांग्रेस का संकट

Tue, 22 Jul 2014 07:51 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Tue, 22 Jul 2014 07:51 PM IST
विज्ञापन
crisis of congress

लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बावजूद देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस खुद को बदलने को तैयार नहीं दिखती। महाराष्ट्र में पृथ्वीराज चव्हाण और असम में तरुण गोगोई के खिलाफ हो रही खुलेआम बगावत दरअसल पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व की नाकामी को ही उजागर कर रही है।

विज्ञापन


बेशक, महाराष्ट्र में नारायण राणे या असम में हिमंत बिस्वा सरमा अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के कारण केंद्रीय नेतृत्व पर दबाव बना रहे हैं और मोलभाव कर रहे हैं, लेकिन चव्हाण और गोगोई को पार्टी नेतृत्व का एकतरफा संरक्षण नहीं मिलता, तो क्या ऐसी हालत होती? यही हाल हरियाणा का है, जहां भूपिंदर सिंह हुड्डा के खिलाफ कुमारी सैलजा और बीरेंद्र सिंह लगातार आवाज उठा रहे हैं। और लगता ऐसा है कि पार्टी की हालत उस डूबते जहाज-सी हो गई है, जिसके कप्तान को कुछ सूझ नहीं रहा है।
विज्ञापन


होना तो यह चाहिए था कि लोकसभा चुनाव में मिली हार पर पार्टी में मंथन होता और कार्यकर्ताओं में व्याप्त हताशा को दूर करने की कोशिश की जाती। मगर ए के एंटनी की अगुआई में बनी कमेटी ने भी राहुल और सोनिया गांधी के नेतृत्व के लिए सिर्फ कवच का ही काम किया है। वास्तव में पार्टी न तो देशवासियों को और न ही कार्यकर्ताओं को कोई संदेश देने में सफल हो पा रही है। यह हालत तब है, जब पार्टी को अगले कुछ महीनों में महाराष्ट्र, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनावों में जाना है। जम्मू-कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस से उसका गठबंधन टूट ही चुका है और महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी भी उस पर इस बार आधी सीटें देने का लगातार दबाव बना रही है।
विज्ञापन
विज्ञापन


असल में पार्टी में आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत है, जिसकी शुरुआत पार्टी की नीति निर्धारण संस्था कांग्रेस कार्यसमिति से करनी चाहिए, जिसमें थके और चुक गए नेताओं का जमावड़ा है। इसके साथ ही उसे प्रादेशिक स्तर में व्याप्त गुटबाजी को भी दूर करने के बारे में सोचना चाहिए। हैरानी की बात यह है कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में लोकसभा चुनाव से पहले से मौजूद गुटबाजी को पार्टी नजरंदाज करती रही। पार्टी के भीतर युवा और वरिष्ठ नेताओं के भी दो गुट बन गए दिखते हैं, जिनमें खींचतान बढ़ती जा रही है। कांग्रेस को इससे पहले भी कई बार मुश्किल दौर से गुजरना पड़ा है, मगर पार्टी पहले कभी इतनी दिशाहीन और बेबस नजर नहीं आई।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed