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अपराध और न्याय
अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Wed, 06 May 2015 08:50 PM IST
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मुंबई उच्च न्यायालय से सलमान खान को दो दिन की अंतरिम जमानत जरूर मिली है, पर इससे उनका अपराध कम नहीं होता। इस मामले में उच्च न्यायालय के रुख का पता शुक्रवार को ही चल सकेगा, पर सत्र न्यायालय के फैसले ने यह तो साबित किया ही है कि कानून के लिए व्यक्ति का अपराध मायने रखता है, उसकी हैसियत या छवि नहीं।
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सच यह है कि सजा से बचने के लिए सलमान खान ने हरसंभव हथकंडा अपनाया। करीब तेरह साल पहले मुंबई में हुई उस दुर्घटना के चश्मदीद सलमान के अंगरक्षक ने अपना बयान बदला था, तो इसी साल सलमान के ड्राइवर ने यह चौंकाने वाला बयान दिया था कि हादसे के वक्त सलमान नहीं, खुद वह गाड़ी चला रहे थे, जिस पर ड्राइवर की पत्नी तक को आश्चर्य हुआ था।
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खुद सलमान का कहना था कि उन्होंने शराब नहीं पी थी, जबकि उनके वकील ने तो यह तक दलील दी थी कि वह मौत कार की टक्कर से नहीं हुई थी! यह मुकदमा लंबा चला, तो इसकी एक वजह सलमान की अदालत में गैरमौजूदगी भी थी, जिस पर न्यायालय ने फटकार लगाई थी। कानून से आंखमिचौली खेलने के ये उदाहरण ही अपने आप में क्षुब्ध करने वाले हैं, लेकिन सलमान खान को सजा सुनाए जाने के बाद बॉलीवुड ने जिस तरह की प्रतिक्रियाएं व्यक्त की हैं, वे स्तब्ध करने वाली हैं। उनमें अपने विशिष्ट होने का अहंकार और न्यायालय की अवमानना के साथ-साथ संवेदनहीनता की पराकाष्ठा भी सुनाई पड़ती है।
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एक रसूखदार दामाद ने 'मैंगो पीपल' कहकर आम आदमी का जिस तरह मजाक उड़ाया था, बॉलीवुड के एक गायक ने फुटपाथ पर सोने वाले बेघर लोगों को कुत्ते कहकर उसी अहंकार का परिचय दिया है। वे न केवल उन सलमान खान का बचाव कर रहे हैं, जिन पर अपराध के एकाधिक मामले हैं, और जिन्हें विगत में जेल की सजा काटनी पड़ी है, बल्कि वे उनके जघन्य अपराध को दयालुता और मानवीय कार्यों के हवाले से ढकने की कोशिश करने से भी पीछे नहीं हट रहे। किसी के मानवीय कार्य उसे हत्या के अपराध से बरी कैसे कर सकते हैं? सलमान खान को तो कानून उनके किए की सजा देगा ही, लेकिन उस उच्चवर्गीय अहंकार पर अंकुश लगाने की भी जरूरत है, जो अपने गलत कामों को जायज ठहराने की जिद में अमानवीय हो जाता है।