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मुंबई का गुनहगार

Tue, 21 Jul 2015 07:42 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Tue, 21 Jul 2015 07:42 PM IST
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Convict of Mumbai

मार्च, 1993 में मुंबई में हुए शृंखलाबद्ध बम धमाकों के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा क्यूरेटिव पीटिशन खारिज कर दिए जाने के बाद अब साफ हो गया है कि देश की आर्थिक राजधानी में दहशत फैलाने वाले उस हमले में दोषी ठहराए गए याकूब मेमन की फांसी की सजा पर अंतिम मुहर लग गई है।

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हालांकि ठीक इसी समय 23 वर्ष से जेल में बंद याकूब मेमन को फांसी दिए जाने के औचित्य पर भी बहस चल रही है। निश्चय ही, इतने लंबे समय बाद इस फांसी की सजा का सांकेतिक मतलब ही रह गया है, लेकिन इसके साथ ही इस बात का संज्ञान भी लिया जाना चाहिए कि याकूब मेमन को भारतीय न्याय व्यवस्था के तहत अपने बचाव के हर मौके दिए गए। टाडा की विशेष अदालत ने 2007 में जिन लोगों को फांसी की सजा सुनाई थी, उनमें से सिर्फ याकूब की ही सजा को सर्वोच्च न्यायालय ने बरकरार रखा और बाकी लोगों की सजा को उम्रकैद में बदल दिया था।
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जाहिर है, याकूब की भूमिका कहीं अधिक संगीन मानी गई, वह दाऊद इब्राहिम और अपने बड़े भाई टाइगर मेमन के साथ ही इन हमलों का मुख्य किरदार था। यदि देश आज पाकिस्तान से संचालित होने वाले आतंकवाद से जूझ रहा है, तो इसकी शुरुआत मुंबई बम धमाकों से मानी जा सकती है, जिसे अंजाम दिए जाने के लिए याकूब और उनके साथियों ने कुछ युवाओं को हथियारों के प्रशिक्षण के लिए पाकिस्तान भेजा था! यही नहीं, इन हमलों से पहले ही दाऊद और मेमन परिवार ने पाकिस्तान में शरण ले ली थी। एक साथ कई जगह किए गए इन धमाकों में 257 लोगों की जानें तो गई ही थीं, इसका मकसद उस वक्त देश के आर्थिक हितों को चोट पहुंचाना भी था, जब आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू ही हुई थी। आखिर इन धमाकों में मुंबई शेयर बाजार और एयर इंडिया के भवनों तक को निशाना बनाया गया था।
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इन हमलों को बाबरी मस्जिद ढहाए जाने की प्रतिक्रिया बताया गया था, पर यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी भी सभ्य समाज में ऐसी आतंकी कार्रवाई को किसी भी रूप में जायज नहीं ठहराया जा सकता। अलबत्ता न्याय की लंबी प्रक्रिया यह सोचने के लिए जरूर विवश करती है कि न्यायिक और अभियोजन के ढांचे को मजबूत करने की जरूरत है, ताकि समय पर न्याय हो सके।

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