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कांग्रेस की दुविधा
Updated Wed, 03 Apr 2013 09:42 PM IST
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कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने यूपीए के सत्ता के दो केंद्र वाले मॉडल को लेकर चल रही बहस को भले ही खारिज कर दिया हो, मगर यह देखने वाली बात है कि क्या कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के रूप में नौ वर्ष से सरकार चला रही इस जोड़ी को सफल कहा जा सकता है?
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पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र के लिहाज से देखें, तो यह अच्छी व्यवस्था है कि संगठन और सरकार की कमान अलग-अलग हाथों में हों। ऐसा नेहरू, शास्त्री और इंदिरा के प्रधानमंत्रित्वकालों में भी हुआ था, जब कांग्रेस की कमान यूएन ढेबर, कामराज, निजलिंगप्पा, नीलम संजीव रेड्डी से लेकर शंकरदयाल शर्मा सहित अनेक लोगों के हाथों में रही।
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अलबत्ता राजीव गांधी और नरसिंह राव ही कांग्रेस के दो ऐसे प्रधानमंत्री थे, जो अपने पूरे कार्यकाल के दौरान पार्टी के भी अध्यक्ष थे। हालांकि यह भी सच है कि सोनिया-मनमोहन की जोड़ी पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र से नहीं, बल्कि राजनीतिक परिस्थितियों से उपजी व्यवस्था है।
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कांग्रेस भले ही सोनिया-मनमोहन की जोड़ी को सफल करार दे रही है, मगर विपक्षी दलों ने ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय साख एजेंसियों और निवेशकों तक ने सत्ता के दो केंद्रों पर सवाल खड़े किए हैं। आर्थिक सुधारों के अपेक्षित गति नहीं पकड़ने के पीछे क्या नीतिगत मामलों में सरकार के भीतर मतभेद भी जिम्मेदार नहीं रहे हैं? यदि ऐसा नहीं है, तो फिर खाद्य सुरक्षा और भूमि सुधार से संबंधित महत्वपूर्ण कानूनों को अमल में लाने में इतना वक्त क्यों लग रहा है?
यही हाल नकद सब्सिडी जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे का भी है, जिसे लेकर सोनिया की अगुआई वाली राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद तथा प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार मंडली में मतभेद रहे हैं। सवाल सत्ता के एकाधिक केंद्र का नहीं, सामूहिक जिम्मेदारी का भी है, जिसका मौजूदा व्यवस्था में अभाव दिखता है।
इसके साथ ही कांग्रेस को इस सवाल से निकट भविष्य में जूझना ही पड़ेगा कि क्या वह चुनाव इसी जोड़ी के नेतृत्व में लड़ना चाहती है? वास्तव में यह स्थिति कांग्रेस की दुविधा को ही प्रदर्शित कर रही है, जिसे आज नहीं तो कल यह भी तय करना होगा कि कुछ महीने पहले ही पार्टी में नंबर दो की घोषित हैसियत में आए राहुल गांधी की भूमिका चुनावों में किस तरह की होगी?