ममता हैं कि मानती नहीं
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अगर अतीत से कोई सबक सीखा होता, तो चुनाव आयोग के प्रति इस दुराग्रह का दोबारा परिचय वह कतई नहीं देतीं। पिछले साल पंचायत चुनाव की तारीख और केंद्रीय अर्धसैनिक बल की तैनाती के मुद्दे पर उन्होंने आयोग के खिलाफ लड़ाई छेड़ी थी, लेकिन उसमें सर्वोच्च न्यायालय के दखल के बाद उन्हें झुकना पड़ा था। इसके बावजूद अब सात प्रशासनिक अधिकारियों के तबादले के चुनाव आयोग के निर्देश को—एक साथ इतने अधिकारियों के स्थानांतरण का निर्देश पश्चिम बंगाल के चुनावी इतिहास में विरल ही है—उन्होंने जिस तरह चुनौती दी है, वह स्तब्ध करने वाली है।
यह आक्रामकता तब है, जब इन अधिकारियों के खिलाफ तृणमूल के निरंकुश कार्यकर्ताओं के विरुद्ध कार्रवाई न करने, विपक्षी पार्टियों के प्रत्याशियों को परेशान करने और आदर्श आचार संहिता लागू होने के बाद तृणमूल सांसद से मुलाकात करने की शिकायतें हैं। पश्चिम मिदनापुर के एडीएम और एसपी को चुनावी दायित्व से अलग करने का आयोग का निर्देश तो खासकर सरकार और प्रशासन के बीच के गठजोड़ का ही खुलासा करता है।
यह प्रवृत्ति बेशक नई नहीं है; बीती सदी के नौवें दशक तक चुनावों की निष्पक्षता के बारे में कोई बहुत सोचता भी नहीं था, लेकिन चुनाव आयोग की सक्रियता के बाद सत्ता राजनीति से जुड़ने वाली ममता बनर्जी का यह रुख चौंकाने वाला जरूर है। इसी पश्चिम बंगाल में जब ताकतवर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेषन, फिर एम एस गिल ने चुनावों की निष्पक्षता बहाल करने की प्रक्रिया में वाम मोर्चा सरकारों से मोर्चा लिया था, तब ममता बनर्जी को आयोग के समर्थन में देखा गया था। पर सत्ता में आने के बाद से वह चुनाव आयोग को बार-बार जिस तरह चुनौती दे रही हैं, वह उनके निरंकुश तौर-तरीके का सुबूत है।
पिछले एक महीने में चुनाव आयोग ने पांच राज्यों में चुनावी ड्यूटी से जुड़े डेढ़ सौ से भी ज्यादा अधिकारियों के तबादले का निर्देश दिया, जिनमें उत्तर प्रदेश भी शामिल है। मगर कहीं भी आयोग के फैसले को इस तरह चुनौती नहीं दी गई है। ऐसे में, चुनाव आयोग के प्रति आक्रामकता दिखाकर दीदी अपना नुकसान तो कर ही रही हैं, राज्य में चुनाव के टलने का खतरा भी मोल ले रही हैं।