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सामाजिक सुरक्षा की चिंता
अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Wed, 08 Jul 2015 08:42 PM IST
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उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में हुई बढ़ोतरी को देखते हुए न्यूनतम मजदूरी बढ़ाकर एक सौ साठ रुपये करने के केंद्र सरकार के फैसले को एक मानवीय कदम कहा जा सकता है। हालांकि महंगाई जिस अनुपात में बढ़ रही है, उसमें दैनिक तेईस रुपये की बढ़ोतरी पर्याप्त नहीं है। इससे औद्योगिक मजदूरों के हाथ में महीने में 4,800 रुपये ही आएंगे। कहां तो यह सरकार न्यूनतम मजदूरी बढ़ाकर पंद्रह हजार रुपये मासिक करने पर विचार कर रही थी, लेकिन हम पाते हैं कि उसने इस मामले में पुराने ढर्रे पर ही चलने का फैसला किया।
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तथ्य यह भी है कि न्यूनतम मजदूरी सभी राज्यों में एक समान नहीं है, और यह मजदूरों की मांग और आपूर्ति पर भी कमोबेश निर्भर करती है। लेकिन इस बढ़ोतरी का लाभ यह होगा कि मनरेगा जैसी योजनाओं में, जिसे विश्व बैंक अब दुनिया का सबसे बड़ा सार्वजनिक रोजगार कार्यक्रम बता चुका है, देश के करीब 15 प्रतिशत लोगों को बढ़ी हुई मजदूरी मिलेगी। बेशक असंगठित क्षेत्र में न्यूनतम मजदूरी में बढ़ोतरी का हर जगह अनुपालन नहीं होता, लेकिन इससे यह नैतिक बाध्यता तो पैदा होती ही है कि इससे कम मजदूरी नहीं दी जा सकेगी।
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न्यूनतम मजदूरी में यह वृद्धि मध्य और उच्च मध्यवर्ग के वेतन में होने वाली वृद्धि की तुलना में बहुत कम है, पर जिस देश में गरीबों की बड़ी आबादी है; और सामाजिक-आर्थिक जनगणना के सामने आए आंकड़े खासकर ग्रामीण भारत की जिस दयनीय स्थिति का खुलासा करते हैं, उसके परिप्रेक्ष्य में न्यूनतम मजदूरी में आनुपातिक रूप से कम ही सही, पर हो रही वृद्धि की बिल्कुल अनदेखी भी नहीं की जा सकती। इससे कम से कम यह भरोसा तो मिलता है कि आर्थिक उदारीकरण की तेज रफ्तार के बीच गरीबों की बेहतरी की चिंता है। चूंकि मनरेगा के रूप में दुनिया की सबसे बड़ी सामाजिक सुरक्षा योजना इस देश में चल रही है, ऐसे में, सरकार को चाहिए कि वह इस योजना को न सिर्फ जारी रखे, बल्कि इसके जरिये ज्यादा से ज्यादा लोगों को आंशिक रोजगार के दायरे में लाए।
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इस सरकार ने बजट में मनरेगा का आवंटन तो बढ़ाया, पर साल में निर्धारित कार्यदिवसों की संख्या घटी है, जो चिंतित करने वाली बात है। बेहतर हो कि न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने के बाद अब मनरेगा में सालाना कार्यदिवस बढ़ाने की दिशा में भी कदम उठाया जाए, ताकि गरीबों को इसका फायदा मिले।