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जानलेवा इलाज की कीमत
नई दिल्ली
Updated Thu, 24 Oct 2013 07:54 PM IST
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अप्रवासी भारतीय महिला अनुराधा की इलाज के दौरान बरती गई लापरवाही से हुई मौत के मामले में उनके पति को 5.96 करोड़ रुपये हर्जाने दिए जाने का सर्वोच्च अदालत का फैसला देश में स्वास्थ्य सेवाओं की दिशा में अहम मोड़ साबित हो सकता है। बेशक अनुराधा के पति कुणाल को इसके लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी, पर यह भी सच है कि इलाज के दौरान लापरवाही या अज्ञानता की वजह से होने वाली मौतों के मामलों में देश में पीड़ित पक्ष को हर्जाने के रूप में पहले कभी इतनी बड़ी राशि देने के निर्देश नहीं दिए गए थे।
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कोलकाता के जिस एएमआरआई अस्पताल पर इस फैसले की गाज गिरी है, वहां 1998 में अनुराधा को एलर्जी के इलाज के लिए भर्ती किया गया था, मगर वहां उनकी हालत बिगड़ती चली गई और अंततः उन्हें मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल ले जाना पड़ा था, जहां उनकी मौत हो गई। अदालत ने इस अस्पताल के तीन डॉक्टरों को भी दोषी ठहराया है।
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इस मामले ने चिकित्सा सेवा की प्रतिबद्धता, इलाज में लापरवाही और संबंधित इलाज के प्रति अज्ञानता के अंतर को भी रेखांकित किया है। असल में इनसे संबंधित कानूनों की भी लोगों को कम जानकारी है। जैसे कि यह कम लोगों को ही पता होगा कि इलाज में लापरवाही से संबंधित मामले उपभोक्ता अधिकार के दायरे में आते हैं। यह मामला इस अर्थ में भी अनूठा है कि पहली बार इलाज में बरती गई लापरवाही से हुए नुकसान की गणना 'मल्टीप्लायर मैथड' से की गई, जो मोटर वीकल ऐक्ट का ऐसा प्रावधान है, जिसे दुर्घटनाओं के ऐसे मामले में प्रयोग में लाया जाता है, जिनमें पीड़ित की गलती नहीं होती।
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जांच में यह बात सामने आई कि अनुराधा को स्टेराइड की खुराक दी गई थी। अनुराधा खुद भी डॉक्टर थीं और कुणाल भी डॉक्टर हैं, शायद इसलिए वे इलाज में हो रही गड़बड़ी को समझ पाए हों, वरना आम लोगों के लिए तो डॉक्टर भगवान की तरह ही होता है! देश में स्वास्थ्य सेवाओं का जो हाल है, उसमें इलाज में लापरवाही अजूबा नहीं है। पश्चिम बंगाल में ही थोड़े दिनों पहले सौ से अधिक बच्चों को पल्स पोलियो की दवा की जगह हेपेटाइटिस बी वैक्सिन पिला दी गई थी! उम्मीद करनी चाहिए कि यह मामला स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति जागरूकता बढ़ाएगा।