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आम आदमी की दिल्ली
नई दिल्ली
Updated Thu, 02 Jan 2014 08:26 PM IST
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राजधानी दिल्ली में विधानसभा चुनाव के नतीजों ने सरकार गठन के बारे में अनिश्चय की जो स्थिति पैदा की थी, अरविंद केजरीवाल की सरकार द्वारा सदन में विश्वास मत जीत लेने के बाद तात्कालिक तौर पर वह दूर हो गई है। अब कम से कम छह महीने तक आम आदमी पार्टी की सरकार को किसी तरह का खतरा नहीं है; नियमतः अविश्वास प्रस्ताव इसके बाद ही लाया जा सकता है।
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वस्तुतः कांग्रेस के समर्थन के बाद विश्वास मत का पारित होना तय माना जा रहा था। शुरुआत में आप को समर्थन देने के मुद्दे पर कांग्रेस के शीला दीक्षित गुट ने चाहे जैसा भी रुख दिखाया हो, लेकिन सच्चाई यह है कि विधानसभा चुनाव में भारी दुर्गति के बाद उसके पास समर्थन देने के सिवा कोई चारा भी नहीं था। विश्वास मत के लिए हुई बहस के दौरान कांग्रेस ने यह संकेत भी दिया। इस तरह वह भाजपा को दिल्ली में सरकार बनाने से भी रोक सकती है, और आप की परछाई में रहकर लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की लहर का मुकाबला भी कर सकती है। आदर्श घोटाले की जांच रिपोर्ट को, आंशिक तौर पर ही सही, ठीक इसी समय स्वीकार कर उसने यही संदेश देने की कोशिश की है कि वह भ्रष्टाचार के खिलाफ है।
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हालांकि यह आप पर निर्भर करेगा कि वह कांग्रेस को कितनी दूर तक ढोना चाहेगी। जहां तक भाजपा का सवाल है, तो वह अब तक आप पर सीधे हमले से यथासंभव बचती रही है; सदन में नेता विपक्ष हर्षवर्द्धन का भाषण इसी का नमूना था, लेकिन चूंकि केजरीवाल की लोकप्रियता मोदी के लिए खतरा है, इसलिए पार्टी लंबे समय तक इस रक्षात्मक रणनीति पर नहीं चल सकती।
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अलबत्ता कांग्रेस के समर्थन को अपनी स्थिरता की गारंटी मानने की खुशफहमी से केजरीवाल सरकार को बचना होगा। उसकी छवि उसके गंभीर कामकाज से ही बनेगी, जिसका उसने वायदा किया है। सरकार बनाने के बाद ही आप ने हालांकि पानी और बिजली सस्ता करने के अलावा निजी बिजली कंपनियों की कैग से जांच कराने की दिशा में कदम उठाए हैं। लेकिन अपने भाषण में मुख्यमंत्री केजरीवाल ने जो मुद्दे उठाए हैं, उन पर अमल करने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति और सक्रियता, दोनों जरूरी हैं। जाहिर है, आप की प्रयोगशाला पर अब पूरे देश की निगाह रहेगी।