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फिर साथ आने की मजबूरी

Wed, 15 Apr 2015 08:07 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Wed, 15 Apr 2015 08:07 PM IST
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come with restraints

राजनीतिक अनिवार्यता ने जनता परिवार के छह दलों को ढाई दशक से भी अधिक समय बाद दोबारा विलय के लिए जिस तरह से विवश किया है, वह वाकई देखने लायक है। अंतर सिर्फ यह है कि तब कांग्रेस के खिलाफ इन दलों ने भाजपा को साथ लिया था, और आज वे भाजपा के खिलाफ एक मंच पर हैं! इस राजनीतिक व्यूह रचना में कांग्रेस अभी नेपथ्य में है, लेकिन आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में इस एकीकृत जनता दल के प्रदर्शन को तमाम राजनीतिक पार्टियां उत्सुकता के साथ जरूर देखना चाहेंगी।

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बेशक राजनीति अनिश्चयता का खेल है, इसके बावजूद जनता परिवार के इस विलय का महत्व प्रतीकात्मक ही अधिक लगता है। इसकी एक वजह तो इसका पुराना रिकॉर्ड ही है; जनता परिवार अहं और अवसरवाद को पीछे छोड़कर दीर्घस्थायी और मजबूत विकल्प में तब्दील नहीं हो पाया। विगत में केंद्र की सत्ताधारी पार्टी का फौरी विरोध इन्हें एक साथ ले तो आया था, पर आपसी लड़ाई के कारण इन्हें अलग होने में भी ज्यादा वक्त नहीं लगा। इनकी मौजूदा एकजुटता के पीछे भी भाजपा का सैद्धांतिक विरोध ही ज्यादा है, और उस पर भी इस साल होने वाला बिहार विधानसभा चुनाव ही इस विलय का तात्कालिक कारण नजर आता है। उसके बाद यह एकीकृत परिवार किस रूप में आगे बढ़ेगा, यह अभी स्पष्ट होना बाकी है।
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इसके अलावा विगत में जनता परिवार मूल्यों और मुद्दों की राजनीति करने के लिए भी उतना नहीं जाना गया; इसी गठजोड़ में शामिल कुछ दलों को भाजपा के साथ होने या उसका समर्थन लेने में गुरेज नहीं रहा है। अगर यह सच है कि बिहार विधानसभा चुनाव को देखते हुए नीतीश कुमार के जोर देने के बाद ही मुलायम सिंह ने विलय की औपचारिक घोषणा की, और अखिलेश की आपत्ति के कारण फिलहाल इसके नाम, झंडा और चुनाव चिह्न पर फैसला टल गया है, तो यही इसके अंर्तविरोधों को बताने के लिए काफी है।
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मुलायम सिंह यादव इस एकीकृत जनता परिवार के मुखिया होंगे, इसके बावजूद इस विलय पर सपा ही सबसे सशंकित बताई जा रही है। ऐसे में, यह सोचना भी बहुत ज्यादा उम्मीद करना होगा कि पिछली गलतियों से सीख लेकर इस बार यह परिवार सत्ताधारी भाजपा का मजबूत विकल्प बनेगा।

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