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कोयले से सुलगते सवाल
Updated Fri, 26 Apr 2013 10:41 PM IST
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सीबीआई निदेशक रंजीत सिन्हा द्वारा कोयला घोटाले की जांच के सिलसिले में सर्वोच्च अदालत में दिए गए हलफनामे के बाद यह शक पुख्ता ही हुआ है कि केंद्र सरकार केंद्रीय जांच एजेंसी के कामकाज में दखल देती है।
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यों कहा जा सकता है कि सीबीआई निदेशक ने जब खुद ही माना है कि उन्होंने सर्वोच्च अदालत में पेश किए जाने से पहले ड्रॉफ्ट रिपोर्ट विधि मंत्री अश्विनी कुमार, प्रधानमंत्री कार्यालय के संयुक्त सचिव और कोयला मंत्रालय के अधिकारियों को दिखाई थी, तो इससे अधिक पारदर्शिता और क्या हो सकती है!
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मगर बात इतनी सरल है नहीं, क्योंकि सीबीआई ने ऐसा 'विधि मंत्री की इच्छा के अनुसार' किया। ऐसा तब हुआ है, जब पिछले महीने ही सर्वोच्च अदालत ने सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल को हिदायत दी थी कि वह संभलकर बयान दें, क्योंकि उनके बयान से सीबीआई जांच प्रभावित हो सकती है।
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यही नहीं, जांच एजेंसी के वकील ने अदालत में दावा किया था कि रिपोर्ट सरकार के किसी प्रतिनिधि को नहीं दिखाई गई है। ऐसे में संसदीय कार्यमंत्री कमलनाथ का यह बयान कितना बचकाना है कि सीबीआई के निदेशक ने विधि मंत्री को सिर्फ ड्रॉफ्ट रिपोर्ट दिखाई थी, अंतिम रिपोर्ट नहीं।
वास्तव में पिछले वर्ष मार्च में कैग की कोल ब्लॉक आवंटन से संबंधित रिपोर्ट में 1.86 लाख करोड़ के अनुमानित नुकसान के उजागर होने के बाद से लगातार इस पर लीपापोती करने की कोशिशें जारी हैं।
सीबीआई निदेशक और मंत्रियों की मुलाकातों को सहज या सिर्फ सौजन्यता इसलिए नहीं कहा जा सकता, क्योंकि केंद्रीय जांच एजेंसी अभी ऐसे कई बड़े मामलों की जांच से जुड़ी हुई है, जिसमें सीधे सरकार पर आंच आई है।
प्रशांत भूषण ने ठीक ही सवाल उठाया है कि विधि मंत्री से रिपोर्ट साझा किए जाने के बाद यह जांच स्वतंत्र रह कहां गई? निश्चित ही इस मामले में सर्वोच्च अदालत के फैसले का इंतजार किया जाना चाहिए, मगर सवाल सरकार की नीयत का है, जिसे इतनी बेताबी है कि वह रिपोर्ट पहले देख लेना चाहती है।
ऐसे में यह क्यों नहीं माना जाना चाहिए कि वह ऐसी किसी भी रिपोर्ट को प्रभावित कर सकती है, जिससे उसके अस्तित्व को खतरा हो? 2 जी स्पेक्ट्रम से लेकर कोल ब्लॉक आवंटन तक के मामले में सरकार का रवैया उसकी बेताबी को ही उजागर कर रहा है, जिसके चलते जेपीसी जैसी सांविधानिक संस्था तक की साख को ताक पर रखने से गुरेज नहीं किया गया।