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सीएम बचा ले गए गढ़, हाथ से निकल गया ‘घर’

Mon, 20 Oct 2014 02:11 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ रोहतक
अमर उजाला ब्यूरो/ रोहतक Updated Mon, 20 Oct 2014 02:11 AM IST
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भूपेंद्र सिंह हुड्डा के चौधराहट के नारे के साथ ग्रामीण तो हो लिए, लेकिन शहर ने मुंह मोड़ लिया।
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हुड्डा अपने गृह जिले रोहतक की चार में तीन सीट जीत कर गढ़ बचा ले गए।

घर, हाथ से निकल गया। यानी रोहतक शहर में हुड्डा रहते हैं और यही सीट कांग्रेस के हाथ से निकल गई।

1991 में अपनी परंपरागत रोहतक सीट खोने के बाद इसे दोबारा हासिल करने में भाजपा को 23 साल लग गए। गढ़ी-सांपला-किलोई, महम और कलानौर पर में एकबार फिर जीत हासिल कर हुड्डा यहां हाथ जमाए रखने में कामयाब रहे। हुड्डा अपने हलके गढ़ी-सांपला-किलोई से 47 हजार से ज्यादा मतों से जीते हैं। लेकिन 2009 के चुनाव के जहां जीत का अंतर 72 हजार रहा। वहीं, इस बार जीत का अंतर घटकर 47185 रह गया है। घटे मार्जन से यह तो साफ हो गया कि इस बार हलके में उनसे नाराजगी जरूर थी।
रोहतक में विकास पर घिरे, सीट खो दी
पूरे प्रदेश में रोहतक में विकास कराने के मुद्दे को लेकर विपक्षी पार्टियां हुड्डा को घेरती रहीं। लेकिन कांग्रेस ने यही सीट गंवा दी। यहां विकास भी हुआ। सीएम सिटी होने का फायदा भी शहर को मिला, लेकिन पिछले तीन चुनाव में मात खा चुके भाजपा के मनीष ग्रोवर इस बार मोदी लहर पर सवार होकर कांग्रेस प्रत्याशी बी. बी. बतरा से आगे निकल गए। ग्रोवर की जीत इसलिए भी मायने रखती है कि रोहतक से बतरा को कुछ समय पहले ही विधानसभा में सर्वश्रेष्ठ विधायक के खिताब से भी नवाजा गया था।
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यह भी जानिए:
- चुनावी दंगल में महम से आनंद सिंह दांगी ने हैट्रिक लगा दी है। वे लगातार तीसरी बार महम से विधायक बने हैं। इससे पहले भी वे एक बार यहां से विधायक रह चुके हैं।
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- महम से भाजपा प्रत्याशी शमशेर खरकड़ा ने 2009 में बतौर निर्दलीय विधानसभा चुनाव लड़ा। कांटे के मुकाबले में वे कांग्रेस प्रत्याशी आनंद सिंह दांगी से हार गए। इसी साल लोकसभा चुनाव में उन्होंने इनेलो की टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। विधानसभा चुनाव से कुछ समय पहले ही वे भाजपा में शामिल हुए और कई दावेदाराें के बीच टिकट तो ले गए, लेकिन जीत नहीं सके।
-गढ़ी-सांपला-किलोई सीट पर 2000 से कांग्रेस का कब्जा है। भूपेंद्र सिंह हुड्डा इस सीट से लगातार चौथी बार चुनाव जीते हैं।
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