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अनपढ़ मां बाप ने बच्चों को कराई पीएचडी

Wed, 01 Oct 2014 09:26 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ रोहतक
अमर उजाला ब्यूरो/ रोहतक Updated Wed, 01 Oct 2014 09:26 AM IST
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childern become phd
फरीदाबाद तहसील का धौद गांव आज भी मरहूम नूर मोहम्मद को याद करता है।
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उन्हें इसलिए याद नहीं किया जाता कि वह जमींदार थे, बल्कि इसलिए कि ठेठ अनपढ़ नूर मोहम्मद और उनकी पत्नी हूर बानो की जिद ने गांव को लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में जगह दिलाई।

रिकॉर्ड भी ऐसा कि दोनों ने अपने चार बेटों को कानून की तालीम दिलाई और चारों ने पीएचडी करके पूरे गांव का नाम रोशन किया। आज चारों भाई उच्च पदों पर तैनात हैं।
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मां आज भी होती है खुश
उनमें से एक बेटा इन दिनों एमडीयू में डीन ऑफ लॉ प्रो. बदरुद्दीन बदर हैं। प्रो. बदरुद्दीन बताते हैं कि माता-पिता अनपढ़ रहे। दोनों की जिद थी कि हम पांचों भाई कानून की पढ़ाई करें। सभी ने उनका ख्वाब पूरा करने के लिए जी तोड़ मेहनत की। बडे़ भाई स्पोर्ट्स पर्सन रहे हैं और पिता के कामों में हाथ बंटाते थे, इसलिए वह ग्रेजुएट ही हुए, लेकिन बाद में कानून के कई पीजी डिप्लोमा कोर्स किए। इसके बाद हम छोटे सभी भाइयों ने कानून की पूरी पढ़ाई की। चारों ने लॉ में पीएचडी किया। पिता तो नहीं रहे लेकिन मां हूर बानो आज भी सभी बेटों के माथे चूमकर दुआएं देती है और उनकी आंखे भर आती हैं।
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दो भाई जज, एक मंत्रालय में
सबसे बड़े भाई अता मोहम्मद गांव के सरपंच हैं और वह पिता का काम देखते हैं। उनसे छोटे भाई डॉ. शमशुद्दीन भारत सरकार की मिनिस्ट्री ऑफ फाइनेंस में एडिशनल डायरेक्टर हैं। उनसे छोटा मैं यानी प्रो. बदरुद्दीन जो एमडीयू यूनिवर्सिटी में एचओडी एंड डीन ऑफ लॉ हूं। उन्होंने बताया कि उनसे छोटे भाई डॉ. शहाबुद्दीन दिल्ली में एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशन जज है। जबकि सबसे छोटे भाई अब्दुल माजिद भिवानी में एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशन जज हैं।

लिम्का बुक में शामिल है परिवार
प्रो. बदरुद्दीन ने बताया कि हम तीन भाइयों ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पीएचडी की जबकि छोटा भाई अब्दुल माजिद ने एमडीयू रोहतक में रह कर पीएचडी पूरी की थी। 2001 में लिम्का बुक की टीम को किसी ने बताया कि धौद में चार भाई लॉ में पीएचडी है। तब वे हमारे यहां आए। जब उन्होंने देखा कि हमारे माता-पिता दोनों ही अनपढ़ हैं तो उन्हें भी हैरत हुई। लिम्का बुक 2001 के वॉल्युम टू केपेज नंबर 84 पर इसे अनपढ़ मां-बाप के कानून में पीएचडी बेटे के नाम से हमारे परिवार का जिक्र किया गया।


इसलिए थी जिद
प्रो. बदरुद्दीन ने बताया कि पिता नूर मोहम्मद जमींदार थे। कई कानूनी मामले उनके सामने आते रहे। अनपढ़ होने के कारण कई बार उन्हें नुकसान भी उठाना पड़ा। ऐसे में उन्हाेंने ठान लिया था कि सभी बच्चों को कानून की ही पढ़ाई कराएंगे और उन्होंने ऐसा किया भी, उन्हें उम्मीद थी कानून की तालीम लेने के बाद बेटे अधिकारों के लिए सक्रिय रहेंगे, न्याय व्यवस्था में उनका भरोसा रहेगा।
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