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बदले स्वास्थ्य क्षेत्र

Fri, 02 Jan 2015 08:48 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Fri, 02 Jan 2015 08:48 PM IST
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Change in healthsector

यह हालांकि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जारी एक मसौदा ही है, पर अगर इस पर सहमति बनती है, तो न सिर्फ तेरह वर्ष बाद राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति का तोहफा मिलेगा, बल्कि वैसे में देश के सभी नागरिक सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा के व्यापक दायरे में आ जाएंगे। स्वास्थ्य बजट में कटौती कर आलोचना के केंद्र में आई एनडीए सरकार का यह मसौदा स्वास्थ्य क्षेत्र में बदलाव की दिशा में एक जरूरी पहल है।

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इसमें शक नहीं कि देश ने स्वास्थ्य के मोर्चे पर तरक्की की है। लोगों की औसत आयु बढ़ी है, नवजात एवं मातृ मृत्यु दर में कमी आई है और चेचक के बाद पोलियो को निर्मूल किया जा चुका है। सस्ती और भरोसेमंद चिकित्सा सुविधा के कारण देश अनिवासी भारतीयों के आकर्षण का केंद्र बना है, और जटिल से जटिल ऑपरेशन चिकित्सा क्षेत्र में हमारी उपलिब्धयों के बारे में बताते हैं। पर इसी मुल्क में नसबंदी शिविरों में गरीब औरतें मारी जाती हैं और मोतियाबंद का ऑपरेशन कराने वाले समूह में आंखें गंवा बैठते हैं! ऐसा इसलिए है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधा पर हमने गंभीरता से ध्यान दिया नहीं। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों और सुविधाओं की कमी है; ग्रामीण भारत जिसका भारी खामियाजा भुगतता है।
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विकल्प में जिस निजी चिकित्सा व्यवस्था का सहारा है, उसमें उन्हीं को राहत मिलती है, जो इलाज का खर्च चुकाने में सक्षम हैं। अमर्त्य सेन जैसे अर्थशास्त्री सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा को व्यापक बनाने की मांग दशकों से करते आ रहे हैं। दुनिया भर के अनुभव भी बताते हैं कि स्वास्थ्य बीमा बगैरह की तुलना में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा को बेहतर करने से लाभ ज्यादा है। सरकार का मसौदा इसी दिशा में सोचते हुए स्वास्थ्य को मौलिक अधिकार बनाने, और स्वास्थ्य पर खर्च को जीडीपी के मौजूदा 1.2 फीसदी से बढ़ाकर ढाई फीसदी करने की बात करता है।
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आजादी के करीब साढ़े छह दशक बाद ही सही, एक ऐसी स्वास्थ्य सुविधा की सचमुच जरूरत है, जिसके दायरे में सभी नागरिक आएं, जिसमें सार्वजनिक और निजी क्षेत्र मिल-जुलकर काम करें, और स्वास्थ्य सेवा पर नजर रखने के लिए जिसमें एक प्रभावी तंत्र हो।

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