फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   Other Archives ›   Challenge of drought

सूखे की चुनौती

Sun, 13 Jul 2014 08:16 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sun, 13 Jul 2014 08:16 PM IST
विज्ञापन
Challenge of drought

देश के पांच सौ जिलों को सूखा आपात योजना में शामिल करने का केंद्र सरकार का फैसला यह साफ-साफ बताता है कि अच्छे दिनों की उम्मीद के बावजूद सूखे के रूप में एक बड़ी चुनौती हमारे सामने है। करीब आधी जुलाई बीत चुकी है, लेकिन स्थिति यह है कि देश के बड़े हिस्से में सूखे पड़े खेत अब भी वर्षा की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इस कारण खरीफ फसल की बुआई तो कम हुई ही है, जल्दी ही पर्याप्त बारिश न हुई, तो बुआई वाले क्षेत्रों में भी भारी नुकसान की आशंका है, क्योंकि फसल पीली पड़ती जा रही है।

विज्ञापन


उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में अगर अब भी पानी बरसता है, तो खरीफ की पछेती किस्म बोई जा सकती है, लेकिन महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में तो अब इसकी भी संभावना नहीं है, क्योंकि वहां पहले ही देर हो चुकी है। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में धान के साथ-साथ मोटे अनाज, दलहन और तिलहन की बुआई भी प्रभावित हुई है। अनुमान के मुताबिक, बारिश के अभाव में एक चौथाई खेती अब तक चौपट हो चुकी है, जिस कारण खरीफ उत्पादन ढाई से तीन करोड़ टन कम रह सकता है!
विज्ञापन


धान के उत्पादन में तो इस बार खासकर कमी की आशंका है, क्योंकि बारिश देरी से और अपर्याप्त होगी, तो किसानों के सामने मोटे अनाज की बुआई के सिवा विकल्प नहीं रहेगा। ऐसी ही आशंका तिलहन फसलों के उत्पादन के बारे में भी जताई जा रही है। इससे पहले सूखे की स्थिति में हमें चीनी और दाल से लेकर खाद्य तेल तक आयात करने पड़े थे। अगर वैसी स्थिति पैदा होगी, तो आयात बिल और महंगाई बढ़ने से अर्थव्यवस्था भी बुरी तरह प्रभावित होगी।
विज्ञापन
विज्ञापन


सूखा सिर्फ खेती ही चौपट नहीं करता, बल्कि अपने साथ और भी कई मुसीबतें लेकर आता है। बारिश के अभाव में देश भर के जलाशयों में इस बार जल संग्रह काफी कम हुआ है, जिससे आने वाले दिनों में पेयजल का संकट गहरा सकता है। सूखे में पशुओं के लिए चारे का संकट भी पैदा होता है, जिससे दूध का उत्पादन तो घटता ही है, खुद पशुओं का जीवन भी संकटग्रस्त हो जाता है। खेत सूखते हैं, तो किसानों और खेत मजदूरों की रोजी-रोटी भी छिन जाती है। इसी आशंका को ध्यान में रखते हुए इस बार मनरेगा में डेढ़ सौ दिनों तक रोजगार की जरूरत बताई जा रही है। कुल मिलाकर, आने वाले दिन खेती-किसानी से लेकर अर्थव्यवस्था के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण साबित होने वाले हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed