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आम आदमी की चुनौती
Updated Mon, 26 Nov 2012 07:42 PM IST
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राजनीति में प्रतीकों का बड़ा महत्व होता है, यह बात अपनी राजनीतिक पारी शुरू करने वाले अरविंद केजरीवाल भी जानते हैं। संभवतः इसलिए उन्होंने अपनी आम आदमी पार्टी का ऐलान उस दिन किया, जिस दिन इस देश ने संविधान को अंगीकार किया था। मगर केजरीवाल और उनके साथियों ने आंदोलनकारी से राजनेता बनने का सफर अभी शुरू किया है, इसलिए उन्हें आगे की चुनौतियों के बारे में बखूबी पता होगा।
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अब वह उस राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा हैं, जिसकी बुनियाद हमारे संविधान ने रखी थी और जिसे लोकपाल के आंदोलन के दौरान कई बार खुद केजरीवाल और उनके साथी चुनौती देते नजर आए थे। भ्रष्टाचार के खिलाफ और जन लोकपाल की मांग को लेकर शुरू हुए आंदोलन की दुविधा अन्ना हजारे के अलग राह पकड़ने और अरविंद केजरीवाल की अगुआई में एक नए राजनीतिक दल के गठन के साथ खत्म जरूर हो गई है, मगर अभी ऐसे ढेरों सवाल हैं, जिनसे इस नई पार्टी को जूझना होगा।
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मौटे तौर पर देखें, तो केजरीवाल और उनके साथियों के सामने पांच बड़ी चुनौतियां हैं, पहला, अच्छे और ईमानदार लोगों को राजनीति से जोड़ना, दूसरा राष्ट्रव्यापी संगठन खड़ा करना, तीसरा इस पार्टी को चलाने के लिए धन का इंतजाम करना, चौथा मीडिया के प्रभाव से मुक्त होकर अपनी पहचान बनाना और सबसे अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण एक राजनीतिक दल के रूप में अपनी आर्थिक, राजनीतिक, विदेश और सामाजिक नीतियों का निर्माण करना।
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मुश्किल यह है कि अभी तक इस नए समूह की कोई व्यापक राजनीतिक दृष्टि सामने नहीं आई है। अभी तक ये लोग भ्रष्टाचार के मामलों को उजागर करते रहे हैं, पर इतने भर से व्यवस्था नहीं बदलती। पहले से जड़ें जमाए बैठे दल एक-दूसरे के खिलाफ यह काम तो पहले से करते ही रहे हैं। इस सबके बावजूद यह स्वीकार करना पड़ेगा कि आज यदि देश के आम आदमी में यह समझ बनी है कि आखिर देश में कानून कैसे बनते हैं, तो इसका श्रेय केजरीवाल और उनके आंदोलन को देना ही चाहिए। उनकी असली परीक्षा अगले कुछ महीनों में होने वाले चुनावों में होगी और तभी पता चलेगा कि वह आम आदमी का कितना भरोसा जीत पाए हैं।