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चुनौती तो अब शुरू होगी

Wed, 02 Oct 2013 09:00 PM IST
अमर उजाला, दिल्ली
अमर उजाला, दिल्ली Updated Wed, 02 Oct 2013 09:00 PM IST
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राहुल गांधी ने जब सजायाफ्ता सांसदों और विधायकों की सदस्यता बरकार रखने से संबंधित अध्यादेश पर सार्वजनिक तौर पर नाराजगी जताई थी, तभी साफ हो गया था कि यूपीए सरकार इसे वापस ले लेगी। कांग्रेस उपाध्यक्ष ने जल्दबाजी तो दिखाई, लेकिन दागियों को संसद और विधानसभाओं से जाना पड़े, तो इसका श्रेय उन्हें दिया ही जाएगा।

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असल में इस पूरे घटनाक्रम के दो पहलू हैं, जिसमें से एक कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति से जुड़ा है और दूसरा देश की राजनीति से। राहुल को पार्टी इसी वर्ष जनवरी में उपाध्यक्ष बनाकर अपना भावी नेता मान चुकी है, लेकिन लगता है कि वह अब अपने अधिकारों को लेकर कहीं अधिक सचेत हो गए हैं, इसलिए उन्होंने प्रधानमंत्री के स्वदेश लौटने तक का इंतजार नहीं किया। मगर सच यह है कि उनकी चुनौती तो अब शुरू होगी, क्योंकि इस घटनाक्रम के बाद उनके न चाहने के बावजूद राहुल बनाम मोदी की बहस और तेज होगी।
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जहां तक देश की राजनीति का सवाल है, तो इस एक फैसले की जद में आने से बचने के लिए लोग पाला बदलते दिखें, तो हैरत नहीं होनी चाहिए। सजायाफ्ता सांसदों और विधायकों की सदस्यता खत्म होने से तात्कालिक राजनीतिक समीकरण भले उलट-पुलट जाएं, लेकिन राजनीति को अपराधीकरण से पूरी तरह मुक्त करना आसान नहीं है। और इसके लिए किसी एक पार्टी को दोष नहीं दिया जा सकता।
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हकीकत यह है कि 2009 के लोकसभा चुनाव और 2008 के बाद हुए विधानसभा चुनावों के बाद चुने गए कुल 4,807 सांसदों और विधायकों में से 1,460 यानी 30 फीसदी पर आपराधिक मामले दर्ज हैं और इनमें से 14 फीसदी पर गंभीर मामले हैं! इस मामले में कोई भी राजनीतिक दल बेदाग नहीं है। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सर्वदलीय बैठक में भाजपा सहित अधिकांश दल सर्वोच्च अदालत के उस फैसले के खिलाफ थे, जिसमें दो वर्ष या उससे अधिक की सजा होने पर सांसदों और विधायकों की सदस्यता रद्द करने और छह वर्ष तक चुनाव लड़ने पर रोक का फरमान था। लाख टके का सवाल है कि क्या राजनीतिक दल यह संकल्प लेने को तैयार हैं कि वे चुनावों में दागियों को टिकट नहीं देंगे? वैसे वे चाहें, तो इसकी शुरुआत आसन्न विधानसभा चुनावों से कर सकते हैं।

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