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सीबीआई की साख
नई दिल्ली
Updated Fri, 21 Nov 2014 07:53 PM IST
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सर्वोच्च अदालत के 2जी स्पेक्ट्रम की जांच से सीबीआई के निदेशक रंजीत सिन्हा को अलग करने के आदेश से उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी पर ही नहीं, बल्कि देश की शीर्ष जांच एजेंसी की साख पर भी गंभीर सवाल उठा है। सीबीआई के इतिहास में संभवतः यह पहला मौका है, जब शीर्ष अदालत ने इसके निदेशक के खिलाफ इतनी सख्त टिप्पणी की है।
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अदालत ने उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों को प्रथम दृष्टया सही माना है, लेकिन सिन्हा लगातार 2जी स्पेक्ट्रम और कोयला घोटाले के अभियुक्तों से हुई मुलाकातों को लेकर उठे सवालों पर पर्दा डालने की कोशिश करते रहे हैं। यह बात मायने नहीं रखती कि उनके घर से मुलाकातियों से संबंधित रजिस्टर किसने और कैसे गायब किया, अहम सवाल यह है कि क्या सीबीआई के निदेशक ने अभियुक्तों को मदद पहुंचाने की कोशिश की?
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बेशक, सीबीआई की साख को लेकर पहले भी सवाल उठे हैं और उसे राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने के आरोप लगते रहे हैं। मगर सीबीआई निदेशक सिन्हा की भूमिका 2जी स्पेक्ट्रम और कोयला घोटाले के मामलों में शुरू से संदेह के घेरे में रही है। उनके सीबीआई निदेशक रहते ही कोयला घोटाले की स्टेटस रिपोर्ट्स में पिछली यूपीए सरकार के समय बदलाव किया गया था, जिस पर सर्वोच्च अदालत ने जांच एजेंसी को फटकार लगाई थी। उसी दौरान अदालत ने सीबीआई को 'पिंजरे का तोता' करार दिया था।
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जाहिर है, पूरी बात घूम-फिरकर सीबीआई की स्वतंत्रता पर आ टिकती है, जिसके बिना उसके निष्पक्ष होकर काम करने की उम्मीद नहीं की जा सकती। देश की शीर्ष जांच एजेंसी की प्रतिष्ठा को बचाए रखने के लिए जरूरी है कि इसे सरकारी और राजनीतिक नियंत्रण से मुक्त किया जाए और स्वायत्त रूप से काम करने दिया जाए।
फिलहाल तो एनडीए सरकार को यह सोचना है कि वह सिन्हा के सेवानिवृत्त होने के बाद नए निदेशक की नियुक्ति किस तरह करेगी, क्योंकि इसके लिए लोकपाल अधिनियम में भी संशोधन होना है, ताकि नेता प्रतिपक्ष की गैरमौजूदगी में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता को चयन समिति का सदस्य बनाया जा सके।