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सीबीआई की स्वायत्तता
Updated Fri, 14 Dec 2012 08:43 PM IST
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समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव और उनके पुत्रों मुख्यमंत्री अखिलेश तथा प्रतीक के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति से संबंधित मामले की जांच जारी रखने का निर्देश देने के साथ ही सर्वोच्च अदालत ने सीबीआई की स्वतंत्रता को भी रेखांकित किया है।
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केंद्रीय जांच एजेंसी को अपनी स्थिति रिपोर्ट सरकार के बजाय अदालत को सौंपने का निर्देश ही यह समझने के लिए पर्याप्त है कि सीबीआई के कामकाज में दखल दिया जाता है। सवाल सिर्फ इस एक मामले का नहीं है, सीबीआई की छवि ही कुछ ऐसी बन गई है कि उसकी निष्पक्षता पर संदेह होता है।
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सीबीआई के भीतर से भी उस पर राजनीतिक दबाव बनाए जाने की खबरें आती रही हैं, जैसा कि अभी इसके एक पूर्व निदेशक उमाशंकर मिश्र ने दावा किया है कि जांच एजेंसी पर पूर्व मुख्यमंत्री मायावती से संबंधित आय से अधिक संपत्ति के मामले में जांच धीमी रखने का दबाव था।
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सेंट किट्स, चारा घोटाला और बोफोर्स तोप सौदे की दलाली सहित कई बड़े मामलों की जांच से जुड़े रहे पूर्व निदेशक जोगिंदर सिंह भी राजनीतिक दबाव डाले जाने का आरोप लगा चुके हैं। उनकी यह टिप्पणी भी गौर करने लायक है कि जरूरी नहीं कि राजनीतिक दबाव या हस्तक्षेप प्रत्यक्ष रूप से दिखे ही, कई बार ऐसी परिस्थितियां बनाई जाती हैं, जिससे जांच प्रभावित होती है और मामला कमजोर पड़ने लगता है।
वास्तव में सीबीआई का गठन दिल्ली पुलिस विशेष स्थापना अधिनियम के तहत एक स्वतंत्र जांच एजेंसी के रूप में किया गया था। मगर, उसे हमेशा सत्तारूढ़ दल या गठबंधन के हथियार के तौर पर देखा गया। इसकी शुरुआत तो 1970 के दशक में ही हो गई थी, जब सीबीआई के तत्कालीन निदेशक डी सेन को दो बार सेवावृद्धि दी गई थी, जिसकी आलोचना आपातकाल के दौरान हुई ज्यादती की जांच करने वाले शाह आयोग ने की थी।
ऐसा नहीं है कि इस स्थिति के लिए सिर्फ कांग्रेस या यूपीए ही दोषी है, जो पूर्व निदेशक मिश्र आज दबाव की बात कर रहे हैं, उनकी नियुक्ति तो एनडीए के समय ही हुई थी। मामलों को तार्किक परिणति तक पहुंचाने के मामले में भी सीबीआई का रिकॉर्ड अच्छा नहीं रहा है, भ्रष्टाचार के अधिकांश बड़े मामलों में दोषियों को सजा दिलाने में वह नाकाम रही है। यह वाकई देखने वाली बात है कि क्या सर्वोच न्यायालय के निर्देश के बाद उसके कामकाज के तौर-तरीके में कोई बदलाव आता है।