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संसद की दाल-रोटी

Wed, 24 Jun 2015 08:10 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Wed, 24 Jun 2015 08:10 PM IST
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canteen of parliament

निरंतर बढ़ती महंगाई से आम आदमी की थाली से दाल गायब हो गई है, लेकिन माननीय जनप्रतिनिधियों को संसद की कैंटीन में दाल फ्राई के लिए सिर्फ चार रुपये खर्च करने पड़ते हैं! इस कैंटीन में मसाला डोसा छह रुपये में, मटन करी बीस रुपये में और मांसाहारी थाली सिर्फ तैंतीस रुपये में मिल जाती है। खाने-पीने की चीजों की यह कीमत अविश्वसनीय है, पर सच है।

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इस सस्ती कैंटीन का लाभ उठाने वाले वे लोग हैं, जो निरंतर बढ़ती महंगाई और आम आदमी की परेशानियों पर संसद में चर्चा करते हैं। यही लोग तय करते हैं कि कितने रुपये दैनिक कमाने वालों को गरीब माना जाए। पर विद्रूप देखिए कि संसद का सत्र चलने के दौरान कैंटीन में भोजन करने पर करीब 1.4 लाख रुपये मासिक की आय वाले इन जनप्रतिनिधियों को जितने रुपये चुकाने पड़ते हैं, एक आम आदमी को किसी ढाबे में खाना खाने के लिए उससे कहीं अधिक रुपये खर्च करने पड़ते हैं।
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यह ठीक है कि संसद की सस्ती कैंटीनों का लाभ सांसदों के अलावा दूसरे लोग भी उठाते हैं, जिनमें बाबू, पत्रकार और सुरक्षाकर्मी आदि होते हैं। पर कोई भी मानेगा कि यह सुविधा मूलतः सांसदों और संसद के कर्मचारियों के लिए ही है। अन्यथा आम आदमी के लिए लागत से कम कीमत पर ऐसी सुविधा मिलने से तो रही। हद तो यह है कि जब हर साल रोजमर्रा की चीजों के दाम बढ़कर ड्योढ़े-दोगुने तक हो जाते हैं, तब संसद की कैंटीनों में खाद्य पदार्थों की कीमत पिछले करीब साढ़े चार साल से नहीं बढ़ी है। उतना ही हैरतनाक यह तथ्य है कि जब सब्सिडी को खत्म करने की लगातार कोशिशें हो रही हैं, तब संसद की कैंटीनों को पिछले पांच वर्षों में साठ करोड़ से भी अधिक सब्सिडी दी गई है।
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हमारे जनप्रतिनिधियों को पहले से ही बहुतेरी सुविधाएं मिली हुई हैं और वे अपने वेतन-भत्ते भी खुद बढ़ा लेते हैं। फिर उन्हें भोजन पर सब्सिडी क्यों? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों उन लोगों से रसोई गैस की सब्सिडी छोड़ने की बात कही, जो बाजार की कीमत पर गैस खरीद सकते हैं। संसद की कैंटीनों को भी क्या इसी तरह सब्सिडी से मुक्त नहीं करना चाहिए? जब महंगाई का बोझ ढोते हुए आम जनता की कमर टूट रही है, तब उन जनप्रतिनिधियों को सब्सिडी का लाभ मिलते देखना क्षुब्ध करता है, जो बाजार की कीमत पर भुगतान कर सकने में सक्षम हैं।

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