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तुष्टिकरण के सहारे

Fri, 25 Apr 2014 08:21 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Fri, 25 Apr 2014 08:21 PM IST
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By dint of appeasement

घोषणापत्र जारी करने के करीब महीने भर बाद कांग्रेस को अब एक पूरक घोषणापत्र लाने की जरूरत क्यों पड़ी है, जो ज्यादातर मुस्लिम समुदाय की बेहतरी के वायदे पर केंद्रित है? मूल घोषणापत्र में भी पार्टी ने पिछड़े मुसलमानों को आरक्षण का लाभ देने की बात कही है, पर पूरक घोषणापत्र में विस्तार से बताया गया है कि अगर कांग्रेस सत्ता में आती है, तो अन्य पिछड़ा वर्ग के तहत दिए जाने वाले आरक्षण में पिछड़े मुस्लिमों को साढ़े चार फीसदी का कोटा मिलेगा। इसमें अल्पसंख्यक समुदायों के सभी दलितों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने समेत कई वायदे हैं।

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मुसलमान समेत सभी अल्पसंख्यक समुदायों को विकास का लाभ मिले, इससे किसी को इन्कार नहीं है। लेकिन मुश्किल यह है कि कांग्रेस की यह 'सदिच्छा' चुनावी लाभ की मंशा से प्रेरित ज्यादा लगती है। चुनाव से पहले भी सोनिया गांधी की शाही इमाम से मुलाकात और मुस्लिम समुदाय को कांग्रेस के लिए वोट करने की उनकी अपील यह देश सुन चुका है। मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति सिर्फ कांग्रेस करती हो, ऐसा भी नहीं है।
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चुनावी दौर में अरविंद केजरीवाल को तौकीर रजा से और भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह को कल्बे सादिक से मुलाकात करते हुए देखा ही गया है। पर आधे से अधिक मतदान हो चुकने के बाद कांग्रेस को अचानक मुस्लिम समुदाय को यह बताने की जरूरत क्यों पड़ रही है कि सत्ता में आने के बाद उसके हित में वह क्या-क्या कदम उठाएगी? क्या इसलिए कि जो अल्पसंख्यक समुदाय उसका वोट बैंक माना जाता रहा है, हाल के चुनावों में वह उससे दूर छिटकता चला गया है और इस बार ध्रुवीकरण की भाजपाई रणनीति को देखते हुए उसे भी ऐसी कवायद की जरूरत है?
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केंद्र की सत्ता में दस साल रहते हुए वह इनकी बेहतरी के लिए तमाम कदम उठा सकती थी। पर मुसलमानों को अन्य पिछड़ा वर्ग में साढ़े चार फीसदी आरक्षण देने की घोषणा भी उसने कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव से पहले की थी, जिस पर अदालतों को रोक लगानी पड़ी। जब उस समय वह अदालतों को इस बारे में आश्वस्त नहीं कर पाई थी, तो अब कैसे करेगी? ऐसे में यही लगता है कि सत्ता-विरोधी रुख भांपते हुए कांग्रेस पूरक घोषणापत्र के जरिये अपनी खोई जमीन वापस पाने की आखिरी कोशिश कर रही है।

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