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एक विवश वित्त मंत्री का बजट

Thu, 28 Feb 2013 10:30 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Thu, 28 Feb 2013 10:30 PM IST
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budget of a helpless finance minister

वैश्विक मंदी के असर, चालू खाते और राजकोषीय घाटे की चुनौतियों तथा मुद्रास्फीति के कारण आर्थिक विकास दर के करीब एक दशक के निम्नतम स्तर पर उतर आने के बीच अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाने वाला बजट पेश करना मामूली काम नहीं है। तिस पर चुनाव के पहले का आखिरी पूर्ण बजट होने के कारण वित्त मंत्री पलनिअप्पन चिदंबरम को अपने मतदाताओं का भी ख्याल रखना था।

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कृषि के लिए आवंटन बढ़ाकर, किसानों को कर्ज देने के लिए निजी बैंकों को भी जोड़कर, मनरेगा के लिए 33,000 करोड़ रुपये देकर और खाद्य सुरक्षा विधेयक पारित कराने की प्रतिबद्धता जताकर उन्होंने ग्रामीण मतदाताओं को निराश नहीं किया है। इसी तरह कर स्लैब में कोई परिवर्तन न करते हुए पांच लाख तक की आय वाले नौकरीपेशा लोगों को दो हजार रुपये की मामूली राहत देकर, जवाहरलाल नेहरू नेशनल अर्बन रीनुअल मिशन में आवंटन दोगुना कर और पहली बार घर खरीदने वाले को 25 लाख के होमलोन के ब्याज पर एक लाख की राहत देकर उन्होंने शहरी मतदाताओं को भी भुलाया नहीं है।
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स्वास्थ्य, पेयजल, साफ-सफाई, अनुसूचित जाति-जनजातियों की बेहतरी पर जोर देने के अलावा बजट में बुनियादी ढांचे, मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर और विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करने की कोशिशें भी दिखती हैं। अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए वित्त मंत्री के पास विकल्प कम थे, लेकिन जो थे, उनका उन्होंने बेहतर इस्तेमाल किया। हालांकि आर्थिक समीक्षा में टैक्स-जीडीपी अनुपात बढ़ाने की जरूरत को रेखांकित करने के बावजूद बजट में इस पर उदासीनता चुभने वाली है; इसके बजाय वित्त मंत्री ने 'सुपर रिच' पर महज एक साल के लिए अधिभार लगाने का फौरी तरीका ही चुना।
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इसके बावजूद सिगरेट और महंगे मोबाइल पर शुल्क बढ़ाकर, पचास लाख की संपत्ति की बिक्री पर एक फीसदी कर लगाकर और डीजल चालित एसयूवी वाहनों पर उत्पाद शुल्क बढ़ाकर उन्होंने बजट का आंकड़ा तो दुरुस्त किया ही, मौजूदा वित्त वर्ष की आखिरी तिमाही में पूंजीगत खर्च कम कर इस साल का योजनागत खर्च 18 फीसदी घटाया, और बजट में सब्सिडी के मद में करीब 27,000 करोड़ रुपये कम किए। खर्च घटाना और चुनावी साल में बजट को लोकलुभावन बनने से भरसक बचाना ही वित्त मंत्री की सबसे बड़ी उपलब्धि है। लेकिन इन्हीं आधारों पर बजटीय लक्ष्य पर भरोसा करने की ठोस वजहें नहीं दिखतीं।


बजट में गैर-योजनागत खर्च जब योजनागत खर्च से लगभग दोगुना है और राजस्व प्राप्ति के मोर्चे पर शंकाएं हैं, तब राजकोषीय घाटे को नीचे ले जाने का लक्ष्य फिलहाल तो चमत्कार ही ज्यादा लगता है। इसी तरह कुल उधारी को घटाकर चार फीसदी पर ले आने और राजस्व में 21 प्रतिशत बढ़ोतरी का लक्ष्य ही नहीं, बल्कि उसमें विनिवेश और स्पेक्ट्रम की नीलामी पर ज्यादा जोर भी बहुत आश्वस्त करने वाला नहीं। आर्थिक विकास दर पर वित्त मंत्री की चुप्पी भी बहुत कुछ कह जाती है। यही कारण है कि आगे आर्थिक स्थिति सुधरने के उनके आश्वासन पर बहुत भरोसा नहीं होता।

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