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सुधार की उम्मीदों के बीच
संपादकीय
Updated Sun, 01 Mar 2015 01:59 AM IST
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मुद्रास्फीति का थोड़ा भी दबाव न झेलने वाली सरकार के लिए आर्थिक सुधारों को गति देने का जो सुनहरा अवसर राजग सरकार के इस पहले पूर्ण बजट में था, वित्त मंत्री अरुण जेटली उसका सदुपयोग करने में सफल हुए हैं।
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बुनियादी ढांचे को मजबूती देने के लिए सरकारी निवेश की घोषणाओं के साथ बजट में कॉरपोरेट टैक्स को चार वर्षों में घटाकर पच्चीस फीसदी पर ले आने का फैसला है, तो लघु उद्यमियों की बेहतरी और कारोबार के अनुकूल माहौल बनाने की कोशिश के साथ विदेशी निवेशकों को लुभाने की कवायद भी दिखती है। हालांकि कॉरपोरेट टैक्स में कमी अगले वर्ष से होनी है, और बदले में अमीरों और बड़ी कंपनियों से वसूला जाने वाला अधिभार खत्म कर दिए गए संपत्ति टैक्स से बहुत अधिक बताया जा रहा है।
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केंद्रीय करों में राज्यों की हिस्सेदारी बढ़ाने की पृष्ठभूमि में, जिसका जिक्र खुद जेटली ने किया, यह बजट इस अर्थ में विकेंद्रित अर्थव्यवस्था की शुरुआत है, कि अब आर्थिक गतिविधियों के नियामक राज्य होंगे, जिससे संतुलित विकास की उम्मीद बढ़ेगी। बजट में गरीबों और उपेक्षित वर्गों के कल्याण के लिए कई योजनाएं हैं, तो कामगारों को रिटायरमेंट लाभ में विकल्प देने जैसी नवोन्मेषी योजना भी है। पर इस बजट ने देश के विराट मध्यवर्ग को ज्यादा कुछ नहीं दिया है, बल्कि बजट में सर्विस टैक्स और उत्पाद शुल्क बढ़ाने के कुछ ही घंटे बाद पेट्रोल और डीजल में बढ़ोतरी का फैसला महंगाई बढ़ाने वाला ही साबित होगा। आर्थिक अनुशासन के मोर्चे पर बजट निराश करता है।
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ठीक है कि राजकोषीय घाटा लक्ष्य के अनुरूप रहेगा, पर 2.8 फीसदी राजस्व घाटा और योजना व गैरयोजना व्यय में बड़ा फर्क कोई अच्छी तस्वीर पेश नहीं करता। इस आर्थिक असंतुलन के पीछे लोकप्रियतावादी रवैया भी है, अपनी फ्लैगशिप योजनाओं के प्रति मोह भी और चुनावी राजनीति भी।
काले धन के खिलाफ सख्ती की बात तो बजट में है, पर इसकी असलियत आने वाले दिनों में पता चलेगी। इसी तरह विनिवेश और दूसरे मोर्चे से सरकार की प्राप्तियों के बारे में भी अभी ठोस आकलन नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद ज्यादातर अपेक्षाओं पर बजट खरा उतरा है, तो यह कम नहीं।