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मुंडे का ‘सच’
Updated Mon, 01 Jul 2013 02:00 PM IST
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भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे ने पिछले दिनों एक कार्यक्रम में अनायास एक ऐसा 'सच' उगल दिया, जिसे कोई जनप्रतिनिधि सार्वजनिक तौर पर कतई उजागर नहीं करना चाहेगा।
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बढ़ते चुनाव खर्च का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा, 1980 में पहला चुनाव लड़ने का खर्च कोई उनतीस हजार रुपये आया था, जबकि पिछले लोकसभा चुनाव में मेरे आठ करोड़ रुपये खर्च हुए। इस स्वीकारोक्ति ने उन्हें मुसीबत में फंसा दिया है, क्योंकि यह राशि चुनाव आयोग द्वारा तब तय की गई 25 लाख रुपये की खर्च सीमा से बहुत अधिक थी।
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यही नहीं, इससे यह भी साफ हो गया कि पिछले चुनाव में हुए खर्च के बारे में उन्होंने आयोग को जो हलफनामा दिया, वह झूठा था। महाराष्ट्र में कांग्रेस और राकांपा, दोनों मुंडे की मुसीबत पर न सिर्फ उत्साहित हैं, बल्कि वे चाहती हैं कि आयोग उनके खिलाफ सख्त कदम उठाए, जिससे कि उन दोनों सहयोगी दलों के लिए आगामी विधानसभा चुनाव की राह आसान हो जाए। ऐसा नहीं है कि मुंडे चुनाव खर्च के बारे में सच्चाई बताना चाह रहे थे।
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खुद उनकी पार्टी का रवैया भी बताता है कि वह मुंडे के 'सच' से खुश नहीं है। लिहाजा चुनाव आयोग मुंडे के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र है। लेकिन मुंडे ने जो कहा है, उसके जवाब में केवल उन्हें दंडित करना समस्या का हल नहीं है।
चुनाव आयोग को अब गंभीरता से सोचना चाहिए कि बढ़ते भ्रष्टाचार और काले धन की आमद के इस दौर में चुनाव खर्च की सीमा तय करने की उसकी कवायद का कितना औचित्य है? जाहिर है, चुनाव में करोड़ों खर्च करना अब कोई मायने नहीं रखता।
पंजाब में पिछले विधानसभा चुनाव में एक प्रत्याशी ने अकेले पेड न्यूज में जितनी राशि खर्च की, वह आयोग द्वारा तय की गई खर्च सीमा से लगभग दोगुनी थी! जो लोग आज मुंडे के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं, उनमें से कई सीमा से अधिक खर्च की बात दबी जुबान स्वीकार कर चुके हैं।
ज्यादातर राजनीतिक पार्टियों को पारदर्शिता से परहेज है, यह इससे भी पता चलता है कि वे आरटीआई के दायरे में नहीं आना चाहतीं। ऐसे में, यदि वास्तविक चुनाव सुधार करना है, तो चुनाव आयोग को ऐसा रास्ता निकालना होगा, जिससे चुनाव में काले धन के इस्तेमाल पर ही नहीं, बल्कि झूठा हलफनामा दायर करने पर भी रोक लगे।