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बिलावल का राग कश्मीर

Sun, 21 Sep 2014 07:18 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Sun, 21 Sep 2014 07:18 PM IST
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bilawal on kashmir

पाकिस्तान की राजनीति में प्रासंगिक बने रहने के लिए कश्मीर का मुद्दा उठाते रहना जरूरी है, पर पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के युवा मुखिया बिलावल भुट्टो जरदारी के सामने ऐसी कौन-सी मजबूरी थी कि उन्हें यह टिप्पणी करनी पड़ी कि वह पूरा कश्मीर लेकर रहेंगे! पाकिस्तान में अगला चुनाव अभी चार साल दूर है, और विपक्ष के आंदोलन से पैदा गतिरोध के बाद बाढ़ से बेहाल उस मुल्क के बड़े हिस्से को राहत की जरूरत है। ऐसे में, कश्मीर पर बोलने के बजाय अगर बिलावल मुल्क की बेहतरी के बारे में कुछ बोलते, तो इससे उनकी परिपक्वता का पता चलता।

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हालांकि यह नहीं भूला जा सकता कि कश्मीर के लिए हजार वर्ष तक जंग लड़ने की बात उनके नाना जुल्फिकार अली भुट्टो ने ही कही थी। उनकी मां बेनजीर भुट्टो ने भी कश्मीर पर कमोबेश उसी आक्रामकता का परिचय दिया था। पर हाल के वर्षों में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को एक ऐसे राजनीतिक दल के तौर पर देखा गया है, जो भारत के साथ बेहतर संबंध स्थापित करने में यकीन करता है। खुद बिलावल जिस पीढ़ी के हैं, उस पीढ़ी से पुरानी शत्रुता छोड़कर आपसी संबंध को यथार्थ और तार्किकता की कसौटी पर कसने की अपेक्षा की जाती है। दो साल पहले अपनी भारत यात्रा में राहुल गांधी के साथ मुलाकात के दौरान बिलावल ने इस सोच का परिचय भी दिया था।
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चूंकि पिछले चुनाव में, खासकर पंजाब में पीपीपी अपना जनाधार खो चुकी है, इसलिए बिलावल का मुल्तान में कश्मीर राग छेड़ना अपनी पार्टी को खड़ा करने की योजना का हिस्सा हो सकता है। यह भी संभव है कि ताहिर उल कादरी, इमरान खान और नवाज शरीफ की चर्चाओं के बीच पहचान खोती पीपीपी को सुर्खियों में लाने के लिए बिलावल ने यह मुद्दा छेड़ा हो। ऐसा करके उन्होंने कट्टरवादियों को भले खुश किया हो, पर नई पीढ़ी ने इसे बहुत उत्साह से नहीं लिया है।
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भारत में बिलावल की टिप्पणी की आलोचना स्वाभाविक है, लेकिन सोशल मीडिया पर अनेक पाकिस्तानी युवाओं ने भी उनके इस बयान को भावना भड़काने वाला बताकर जिस तरह खारिज किया है, वह देखने लायक है। यह बिलावल जैसे राजनेताओं के लिए सबक होना चाहिए कि जो मुल्क एक के बाद एक कई गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है, कश्मीर का मुद्दा उठाकर वहां की जनता को अब लंबे समय तक बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता।

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