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बड़ी जिम्मेदारी, बड़ी चुनौती

Mon, 10 Jun 2013 10:25 AM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Mon, 10 Jun 2013 10:25 AM IST
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big responsibility, big challenge

गोवा में संपन्न राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को अगले लोकसभा चुनाव की कमान सौंपकर भाजपा ने एक व्यावहारिक कदम उठाया है।

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दरअसल पिछले दो लोकसभा चुनावों में हताशा के बाद अगले चुनाव में वह अपने लिए संभावना देख रही है।

यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में व्याप्त भ्रष्टाचार, महंगाई और आर्थिक हताशा के कारण जनमानस में जो क्षोभ उपजा है, उसी ने भाजपा के लिए एक उम्मीद पैदा की है।
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और इस अवसर को संभावना में बदलने के लिए पार्टी के पास नरेंद्र मोदी जैसा लोकप्रिय चेहरा आज दूसरा नहीं है। सिर्फ यही नहीं कि विधानसभा चुनावों में लगातार तीन बार वह पार्टी को जीत दिला चुके हैं, यह भी कि उनके नेतृत्व में गुजरात विकास की नई ऊंचाइयों पर पहुंचा है।
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सच्चाई यह है कि यूपीए सरकार के हताशाजनक प्रदर्शन और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चुप्पी ने भाजपा के प्रभाव क्षेत्र से बाहर भी नरेंद्र मोदी की राजनीतिक शैली के मुरीद पैदा कर दिए हैं।

उन्हें भ्रष्टाचार और लालफीताशाही के खिलाफ ठोस कदम उठाने वाले व्यक्ति के रूप में ही नहीं, बल्कि एक ऐसे नेता के रूप में भी देखा जा रहा है, जो उद्दंड विदेशी ताकतों को उनकी शैली में जवाब दे सकता है।

लिहाजा उनका चुनाव तो ठीक है, लेकिन कार्यकारिणी के दौरान अंदरूनी मतभेदों से पार्टी की मिट्टी ही पलीद हुई है।

अब तक नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शक के रूप में ख्यात लालकृष्ण आडवाणी की कार्यकारिणी में गैरमौजूदगी केवल स्तब्ध करने वाली ही नहीं थी, बल्कि इससे शीर्ष व्यक्तित्वों की महत्वाकांक्षाओं के बारे में भी पता चलता है।

जबकि सच्चाई यह है कि मोदी को अभी सिर्फ चुनाव की कमान ही सौंपी गई है; वैसे ही, जैसे 2004 में प्रमोद महाजन और 2009 में अरुण जेटली को सौंपी गई थी।

इसके बावजूद गोवा में पार्टी का अंदरूनी झगड़ा जिस तरह सार्वजनिक हुआ है, वह खुद मोदी के लिए भी संदेश होना चाहिए। वस्तुतः यह जिम्मेदारी उनके लिए दोधारी तलवार की तरह है।


अगर वह अपने लक्ष्य में सफल होते हैं, तब भी उनका प्रधानमंत्री बनना तय नहीं है। लेकिन अगर वह अपनी जिम्मेदारी में खरे नहीं उतर पाए, तो यही विरोधी और जोर-शोर से उनके खिलाफ एकजुट हो सकते हैं।

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