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बड़ा चुनावी दांव
नई दिल्ली
Updated Tue, 14 Oct 2014 07:21 PM IST
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लोकसभा चुनावों के तकरीबन पांच महीने बाद हो रहे महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा के चुनाव इन दोनों राज्यों के लिए तो अहम हैं ही, इनसे देश की भावी राजनीति की भी थाह मिलेगी। इसका महत्व इसी से समझा जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन दोनों राज्यों में पिछले दस दिनों के भीतर 38 रैलियां की हैं!
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दरअसल इन दोनों राज्यों में मोदी और अमित शाह ही भारतीय जनता पार्टी का चेहरा हैं और गाहे-बगाहे ये चुनाव भी 'मोदी बनाम अन्य' हो गए हैं। हालांकि महाराष्ट्र और हरियाणा की राजनीतिक परिस्थितियां, जातिगत गणित और कुल मिलाकर वहां के चुनावी मुकाबले बिल्कुल अलग तरह के हैं, जिनकी आपस में तुलना नहीं की जा सकती। मगर ऐसा लगता है कि भाजपा को एक बार फिर 'मोदी लहर' का भरोसा है, जिसके सहारे वह इन दोनों राज्यों में अपने बूते सरकार बनाना चाहती है।
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असल में यही भाजपा की ताकत भी है और कमजोरी भी। मतदान से ठीक एक दिन पहले जिस तरह से उसकी पच्चीस वर्ष पुरानी सहयोगी से शत्रु बन गई शिवसेना हमलावर हुई है, उससे यही लगता है कि शिवसेना मानकर चल रही है कि उसका मुकाबला कांग्रेस, एनसीपी या राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना से नहीं, बल्कि सीधे भाजपा से है।
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वास्तव में ये चुनाव शिवसेना के लिए करो या मरो जैसे हो गए हैं, क्योंकि इस चुनाव में उसने उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश कर अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया है! यही बात एक दशक तक कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार चलाने वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के बारे में कहा जा सकती है, क्योंकि इससे उसकी भी असली ताकत का पता चलेगा।
जहां तक कांग्रेस की बात है, तो वह अपने अंतर्विरोधों और मतभेदों में उलझी हुई है और लोकसभा चुनावों में मिले झटकों से अब तक नहीं उबर पाई है। अलबत्ता हरियाणा में उसका सारा दांव सोनिया या राहुल गांधी पर नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा पर है। पर महाराष्ट्र की तरह भाजपा यहां भी मोदी के सहारे है और वह कांग्रेस को नहीं, बल्कि ओम प्रकाश चौटाला के इंडियन नेशनल लोकदल को अपना प्रमुख प्रतिद्वंद्वी मान रही है।
निस्संदेह ये चुनाव मोदी सरकार के पांच महीने के कार्यकाल पर जनमत संग्रह नहीं हैं, लेकिन ये बताएंगे कि क्या मोदी का जादू अब भी बरकरार है।