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अलग राह पर भट्टराई

Sun, 27 Sep 2015 07:55 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Sun, 27 Sep 2015 07:55 PM IST
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Bhattarai on different path

नए संविधान पर तराई में जारी विरोध-प्रदर्शनों के बीच पूर्व प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई का पार्टी और संसद से इस्तीफा एकीकृत सीपीएन-माओवादी के लिए ही झटका नहीं है, नेपाल की राजनीति पर भी इसका असर पड़ सकता है। वरीयता क्रम में भट्टराई बेशक प्रचंड के बाद दूसरे नंबर के नेता थे, पर नेपाल और उसके बाहर माओवादी पार्टी का चेहरा वही थे।

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पार्टी ने हालांकि भट्टराई को अपने फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए कहा है, पर उनके लौटने की उम्मीद तो दूर, उलटे इस कदम के बाद अनेक समर्थक उनके साथ आ सकते हैं। माओवाद का रास्ता छोड़कर लोकतंत्र और प्रगतिशील राष्ट्रवाद की जरूरत भट्टराई जिस तरह बता रहे हैं, उससे साफ है कि संविधान निर्माण में प्रचंड का वर्चस्ववादी तरीका उन्हें रास नहीं आया। अल्पसंख्यकों की समुचित हिस्सेदारी का पक्षधर होने के कारण भट्टराई संविधान के मसौदे से खुश नहीं थे। पिछले कुछ समय से संविधान पर उनके विचार उनकी पार्टी से अलग तो थे ही, संविधान को अंगीकृत किए जाने के समारोह में शामिल न होकर भी उन्होंने अपनी नाराजगी का इजहार किया था।
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दूसरी ओर, तराई में भड़की हिंसा से बेपरवाह बड़े राजनीतिक दल अब भी जिस रवैये का परिचय दे रहे हैं, उससे सिर्फ थारू और मधेसियों के प्रति उनकी उपेक्षा का ही पता नहीं चलता, यह भी मालूम होता है कि संविधान के मुद्दे पर वे भारत की बात सुनने को तैयार नहीं हैं। सीमा पर फंसे हुए वाहनों और नेपाल में पेट्रो उत्पाद समेत जरूरी वस्तुओं की किल्लत के लिए काठमांडू भारत पर जिस तरह उंगली उठा रहा है, उससे भी यह जाहिर होता है। जबकि भट्टराई इस गतिरोध को सुलझाने के लिए कूटनीतिक पहल करने के लिए कह रहे हैं।
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भट्टराई के फैसले की गंभीरता का पता इससे भी चलता है कि उन्होंने जमी-जमाई राजनीति छोड़ राष्ट्र निर्माण के क्षेत्र में पहल करने का निर्णय लिया है, जिसका कोई स्वरूप ही अभी तय नहीं है। बहुत संभव है, वह संविधान-विरोधी आंदोलन का केंद्रीय चेहरा बनें, जो तराई में भीषण रूप से फैल चुका है। बाबूराम भट्टराई का राजनीतिक भविष्य अभी भले अनिश्चित हो, पर मौजूदा संकट को सुलझाने के लिए नेपाल की सरकार ने अगर अविलंब पहल नहीं की, तो उसका नतीजा गंभीर हो सकता है।

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