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यथास्थिति से आगे

Thu, 18 Sep 2014 09:02 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Thu, 18 Sep 2014 09:02 PM IST
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Beyond the status quo

भारत-चीन के द्विपक्षीय संबंधों के लिहाज से ही नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति की दृष्टि से भी अहम मानी जा रही चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शिखर बैठक के संदेश बहुत साफ हैं। दुनिया के दो सबसे बड़े विकासशाली देशों के नेता द्विपक्षीय संबंधों में यथास्थिति को बनाए नहीं रखना चाहते। बावजूद इसके कि जिनपिंग की भारत यात्रा के दौरान लद्दाख के चुमार सेक्टर में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी और नागरिकों के घुस आने से तनाव बना हुआ है, दोनों नेताओं ने आपसी रिश्तों को मजबूत करने की प्रतिबद्धता जताई है।

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दरअसल दोनों देशों के रिश्तों की राह में सीमा संबंधी मसला सबसे बड़ा रोड़ा है, और हकीकत यह है कि 1990 के दशक से कई दौर की बातचीत के बावजूद वास्तविक नियंत्रण रेखा का निर्धारण नहीं हो सका है। मोदी ने यह मसला उठाया है, जिस पर जिनपिंग ने उन्हें इसके जल्दी सुलझाने का भरोसा जताया है।
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यह समझने की जरूरत है कि द्विपक्षीय संबंध अब सिर्फ सामरिक ही नहीं, बल्कि आर्थिक हितों के आधार पर भी तय होते हैं। लिहाजा दोनों देशों को एक दूसरे की जरूरत है। हालांकि मोदी की जापान यात्रा, जिसमें उन्हें 33 अरब डॉलर के निवेश का भरोसा मिला, के बाद जिनपिंग की भारत यात्रा को लेकर कयास थे कि चीन से भारत को भारी-भरकम निवेश मिल सकता है। इसके उलट जिनपिंग की मौजूदगी में हुए समझौतों के तहत अगले पांच वर्षों में भारत में सिर्फ 20 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की गई है, जिनमें दो आईटी पार्क बनाने से लेकर कैलास मानसरोवर यात्रा के वैकल्पिक मार्ग को मंजूरी जैसे समझौते भी शामिल हैं।
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इसके बावजूद ऐसा लगता है कि जिनपिंग और मोदी, दोनों भारत-चीन संबंधों को आगे ले जाना चाहते हैं, जैसा कि अहमदाबाद में साबरमती के तट से लेकर दिल्ली के हैदराबाद हाउस तक दोनों की भाव-भंगिमाओं में भी नजर आया। इसके साथ ही गौर किया जाना चाहिए कि चीन जहां हिंद महासागर में अपने हित देख रहा है, वहीं भारत दक्षिण चीन सागर में।


यह संयोग नहीं है कि जिनपिंग भारत आने से पहले श्रीलंका से होकर आ रहे हैं, जहां उन्होंने भारतीय सीमा से महज दो सौ किलोमीटर दूर एक समुद्री परियोजना में निवेश की मंजूरी दी, तो भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी वियतनाम के साथ दक्षिणी चीन सागर में तेल की संभावनाएं तलाशने के लिए करार कर लौटे हैं। जाहिर है, एशिया की दो बड़ी ताकतों को एक-दूसरे के हितों को ध्यान में रखना होगा, इसी में क्षेत्रीय शांति और स्थिरता निहित है।

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