समन्वय से आगे
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
नरेंद्र मोदी सरकार और भाजपा के पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पंद्रह बड़े संगठनों के बीच हुई तीन दिनों की बैठक को समन्वय बैठक बताकर खुद संघ ने इसे बहुत तूल न देने की कोशिश की है। यह सह कार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले की प्रेस कॉन्फ्रेंस से भी साफ होता है और संघ प्रमुख मोहन भागवत की सरकार के प्रति अनुकूल टिप्पणियों से भी। पर सरकार के कामकाज पर संघ के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने शुरुआत में जो चिंता जताई, उससे स्पष्ट है कि मोदी सरकार की छवि ने संघ को थोड़ा-बहुत बेचैन तो जरूर किया है। नहीं तो बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले, जिसका नतीजा राष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी तय कर सकता है, तीन दिनों की इस समन्वय बैठक में कई मुद्दों पर संघ के पदाधिकारियों की चिंता सामने नहीं आती।
इस बैठक के औचित्य पर कांग्रेस समेत कुछ विपक्षी दलों के सवाल अपनी जगह हैं, पर यह कोई रहस्य नहीं कि केंद्र की सत्ता में आई भाजपा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से ही पैदा हुई पार्टी है, और इसे दोनों में से किसी ने छिपाया नहीं है। फिर सवाल सिर्फ संघ-भाजपा का नहीं है; हर राजनीतिक पार्टी का वैचारिक संगठन होता है, और सत्ता में आई पार्टी पर तो कई संगठनों के दांव और दावे होते हैं। लिहाजा सवाल इस बैठक के औचित्य पर उतना नहीं है, जितना कि संघ के इरादे पर हो सकता है। वन रैंक-वन पेंशन के मुद्दे को जल्दी सुलझाने, श्रम संगठनों की दस सूत्री मांगें मानने, आंतरिक और बाह्य सुरक्षा को मजबूत करने और आम जनता के हितों में कदम उठाने के लिए सरकार को प्रेरित करने की उसकी कोशिशों में कुछ भी गलत नहीं है, क्योंकि ये देश के हित से जुड़े कदम हैं।
मुश्किल वहां पैदा होगी, जहां संघ विकास के बजाय अपना एजेंडा तय करने के लिए सरकार पर दबाव बनाएगा। इसलिए जम्मू-कश्मीर में गठबंधन धर्म निभाने के बजाय सख्ती अपनाने के लिए कहने और शिक्षा व्यवस्था के भारतीयकरण पर जोर देने जैसी बातें चिंतित ही ज्यादा करती हैं। मोदी सरकार के शुरुआती सवा साल चुनौतियों से भरे रहे हैं, यह प्रधानमंत्री ने भी बैठक में प्रकारांतर से माना है। ऐसे में विकास के एजेंडे से भटकना घातक होगा, यह सरकार को भी समझना चाहिए और संघ को भी।