फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   Other Archives ›   Between Strike and Violence

हड़ताल और हिंसा के बीच

Thu, 07 Nov 2013 08:32 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Thu, 07 Nov 2013 08:32 PM IST
विज्ञापन
Between Strike and Violence

पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश में चुनाव से पहले सत्ता और विपक्ष के बीच तकरार से जो हिंसक स्थिति पैदा हुई है, वह बेशक वहां का अंदरूनी मामला है, लेकिन यह भारत जैसे देशों के लिए भी समान रूप से चिंतनीय होना चाहिए। दरअसल शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग सरकार ने करीब दो साल पहले चुनाव से पूर्व कार्यवाहक सरकार गठित करने के प्रावधान को संविधान संशोधन के जरिये बेअसर कर दिया था।

विज्ञापन


इसके बावजूद विपक्ष एक कार्यवाहक सरकार की देखरेख में चुनाव कराने की मांग पर न सिर्फ अड़ा हुआ है, बल्कि विगत दो सप्ताहों में दो बार उसने हड़ताल बुलाई। इस दौरान जनजीवन अस्त-व्यस्त रहा, अर्थव्यवस्था को भारी क्षति पहुंची और गैरसरकारी आंकड़ों के मुताबिक तीन सौ से भी अधिक लोग मारे गए। बांग्लादेश को हिंसा की इस राह पर ले जाने के लिए, जाहिर है, वहां का कट्टरवादी विपक्ष ही जिम्मेदार है।
विज्ञापन


अब दो घटनाक्रम ऐसे हुए हैं, जिससे विपक्ष सरकार के खिलाफ अपना हमला और तेज करेगा। एक तो सरकार ने बेगम खालिदा जिया के उस भगोड़े बेटे के प्रत्यर्पण की इंग्लैंड से मांग की है, जो भ्रष्टाचार सहित दूसरे कई गंभीर मामलों में वांछित हैं। विपक्षी दल इसे सत्ता पक्ष की दबावी राजनीति बता ही रहा है। मानो यही काफी न हो, अब चुनाव आयोग ने उच्च न्यायालय के एक फैसले के परिप्रेक्ष्य में जमात को अगला चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित कर दिया है।
विज्ञापन
विज्ञापन


दरअसल विगत अगस्त में ही उच्च न्यायालय ने एक राजनीतिक पार्टी के तौर पर जमात के रजिस्ट्रेशन को गैरकानूनी ठहरा दिया था। जमात के सामने अब सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने के सिवा कोई विकल्प नहीं है, लेकिन मानना मुश्किल है कि शीर्ष अदालत उसे कोई राहत देगी। मुक्तियुद्ध के दौरान पाकिस्तान के मददगारों को कठोर सजा दिलवाने के कारण शेख हसीना की सरकार पहले से ही जमात के निशाने पर है। अब उसके चुनाव लड़ने का रास्ता बंद हो जाता है, तो कट्टरवादी नए सिरे से हिंसा और तोड़फोड़ पर उतर सकते हैं।


बांग्लादेश में चुनाव पूर्व हिंसा का इतिहास पुराना है, लेकिन हाल के वर्षों में वहां कट्टरवादियों ने जिस तरह सिर उठाया है, उसमें नए घटनाक्रमों से आशंकाएं ही पैदा होती हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed