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संकल्प और विकल्प के बीच
नई दिल्ली
Updated Fri, 01 Mar 2013 10:15 PM IST
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भारतीय जनता पार्टी ने 'सुशासन के संकल्प' के साथ खुद को यूपीए के विकल्प के तौर पर पेश करने का ऐलान जरूर कर दिया है, लेकिन केंद्र में लौटने का उसका यह सपना राजनीतिक स्तर पर अपनी स्वीकार्यता बढ़ाए बिना पूरा करना आसान नहीं होगा। यह एक कड़वा सच है, जिस पर पार्टी के नेता राष्ट्रीय कार्यकारिणी और राज्य परिषद की बैठक में मंथन जरूर करेंगे।
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पिछले नौ वर्ष से सत्ता में लौटने का सपना देख रही भाजपा भी यह जानती है कि उसे खुद को तो मजबूत करना ही होगा, इसके साथ ही एनडीए को भी यूपीए के विकल्प के रूप में तैयार करना होगा। दरअसल यहीं से पार्टी की चुनौती शुरू होती है, क्योंकि उसके पास आज अटल बिहारी वाजपेयी की तरह कोई व्यापक रूप से स्वीकार्य नेता नहीं है, जिसे सैद्धांतिक और वैचारिक लाइन से हटकर भी दूसरे दलों का समर्थन हासिल था। वास्तव में एनडीए की वह धुरी थे।
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दूसरी ओर भाजपा में नरेंद्र मोदी का प्रभाव बढ़ता जा रहा है और उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने का दबाव भी बनाया जा रहा है, मगर भाजपा के सबसे बड़े सहयोगी जनता दल (यू) को ही उनके नाम पर ऐतराज है। भाजपा के जो संभावित सहयोगी हो सकते हैं, उनमें तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता को छोड़ दिया जाए, तो नवीन पटनायक, चंद्रबाबू नायडू और ममता बनर्जी अपनी राजनीतिक मजबूरियों के कारण उनके नाम पर शायद ही सहमत हों।
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मोदी के पक्ष में हो रही नारेबाजी को लेकर खुद पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने जिस तरह से चेतावनी दी थी, उससे भी समझा जा सकता है कि पार्टी अभी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के नाम की घोषणा से बच रही है। अभी उसके लिए कदाचित यह दिखाना जरूरी है कि पार्टी नए नेतृत्व के साथ पूरी तरह एकजुट है, इससे पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊंचा होगा।
ऐसा नहीं है कि पार्टी पहली बार सुशासन की बात कह रही है, यह तो उसके एजेंडे और कार्यक्रम में पहले से रहा ही है, मगर क्या वह राम मंदिर निर्माण जैसे भावनात्मक मुद्दे को छोड़ पाएगी? इसके साथ ही उसे ठोस आर्थिक और सामाजिक कार्यक्रम के साथ भी जनता के बीच जाने के लिए खुद को तैयार करना होगा। एक-एक कर सामने आए घोटालों, बढ़ती महंगाई और सुस्त पड़ी अर्थव्यवस्था से यूपीए और कांग्रेस की साख गिरी है, मगर सवाल यह है कि क्या भाजपा इस मौके का फायदा उठाने को तैयार है?