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देर आयद दुरुस्त आयद
नई दिल्ली
Updated Wed, 10 Sep 2014 07:32 PM IST
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कर्ज लेकर न चुकाने वाले बड़े कॉरपोरेट घरानों के खिलाफ सेबी और रिजर्व बैंक अब जिस सख्ती का परिचय दे रहे हैं, वह विलंब से उठाया गया कदम होने के बावजूद स्वागतयोग्य है। हमारे अर्थ तंत्र की इस विसंगति पर लगातार सवाल उठाया जाता रहा है, जिसमें एक जरूरतमंद किसान या छोटे व्यापारी को दिए गए कुछ हजार के कर्ज की वसूली के लिए तो सख्त कदम उठाए जाते हैं, पर करोड़ों रुपये कर्ज लेकर न चुकाने वाली कॉरपोरेट कंपनियों के खिलाफ कम ही कार्रवाई होती है।
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सरसरी तौर पर इस कड़ाई के पीछे भले यूबी ग्रुप के मुखिया विजय माल्या हों, पर बड़ी मछलियों की यह सूची काफी लंबी है। सिर्फ यही नहीं कि ऐसे लोगों और कंपनियों को अब 'विलफुल डिफॉल्टर' यानी 'जानबूझकर कर्ज न चुकाने वाले' घोषित किया गया है, बल्कि रिजर्व बैंक ने बैंकों को ऐसी कंपनियों के निदेशकों के नाम बताने, गारंटर को भी विलफुल डिफॉल्टर की श्रेणी में रखने और एक कंपनी के डिफॉल्ट होने पर उस समूह की दूसरी कंपनियों को भी डिफॉल्ट घोषित करने जैसे कदम उठाए हैं। जबकि सेबी ऐसी कंपनियों के बाजार से पूंजी उगाहने पर रोक लगाने समेत दूसरे कदम उठाने जा रहा है।
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यह कदम कितना जरूरी है, यह इसी से समझा जा सकता है कि गैरनिष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) के लगातार बढ़ने से सरकारी बैंकों की हालत खराब है। 2007-08 में जो एनपीए मात्र 39,000 करोड़ रुपये था, वह अब दो लाख करोड़ के पार हो गया है। कॉरपोरेट कंपनियां अकेले इस गोरखधंधे को अंजाम नहीं दे पातीं, इसमें शीर्ष बैंक अधिकारी और राजनेताओं की भी मिलीभगत होती है। सिंडिकेट बैंक के सीएमडी की गिरफ्तारी के बाद यह फिर स्पष्ट हो गया है, जिन्हें कर्ज की सीमा बढ़ाने के लिए रिश्वत दी गई थी।
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कर्ज न चुकाने वाली बड़ी मछलियां तो इतनी निडर हैं कि उनमें से कुछ नए बैंक के लिए आवेदन करने वालों में भी शामिल थीं! बैंकों के राष्ट्रीयकरण के पीछे एक मजबूत तर्क यह था कि निजी बैंकों के कर्ताधर्ता अपने नजदीकियों को ही कर्ज देते हैं। पर उसके करीब साढ़े चार दशक बाद भी मोटा कर्ज लेने और देने वालों का भ्रष्ट तंत्र बन जाए, तो यह विडंबना ही है। इसलिए बड़े बकायेदारों की मुश्कें कसने के साथ उन लोगों को भी दंडित करना होगा, जो उनके 'अपराध' में सहायक होते हैं।