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बेनीवाल की विदाई
नई दिल्ली
Updated Fri, 08 Aug 2014 09:01 PM IST
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मिजोरम की राज्यपाल के पद से कमला बेनीवाल की बर्खास्तगी इस अर्थ में थोड़ी चौंकाने वाली है कि कार्यकाल समाप्त होने से दो महीने पहले उन्हें हटाया गया। अन्यथा केंद्र में सत्ता परिवर्तन के बाद राज्यपालों का यह हश्र नई बात नहीं है। यूपीए सरकार ने केंद्र की सत्ता में आने के बाद एनडीए के समय नियुक्त राज्यपाल हटाए ही थे। नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद एनडीए सरकार ने उसी रास्ते पर चलते हुए ज्यादातर राज्यपालों से पद छोड़ने को कहा।
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कमला बेनीवाल की विदाई उसी की कड़ी है। बल्कि उनकी असामयिक विदाई का चिंतित करने वाला पक्ष यह है कि उनके खिलाफ आर्थिक अनियमितताओं के कई मामले हैं। कुछ मामलों में उनके खिलाफ मुकदमा चलाए जाने की भी बात की जा रही है, जो यह बताने के लिए काफी होना चाहिए कि खुद उन्होंने पद की गरिमा के अनुरूप आचरण नहीं किया। इसके बावजूद यह प्रसंग सत्ता राजनीति के उस निर्मम पक्ष को तो उद्घाटित करता ही है, जो केंद्र में सरकार बदलने पर सामने आता है। सत्ता बदलने पर थोक के भाव राज्यपाल बदले जाते हैं, और सत्ताधारी पार्टी के नेता ही उनकी जगह लेते हैं।
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ऐसी नियुक्तियों के पीछे निष्ठा और पुनर्वास का तर्क काम करता है। इसीलिए दिल्ली में चुनाव हारने के बाद शीला दीक्षित राज्यपाल बन जाती हैं, और इसी तर्क के आधार पर अब भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के राज्यपाल बनने की बारी है। मुश्किलें तब आती हैं, जब केंद्र और राज्य में अलग-अलग सरकारें होती हैं। गुजरात में राज्यपाल रहते हुए मुख्यमंत्री को भरोसे में लिए बगैर लोकायुक्त की नियुक्ति के कमला बेनीवाल के फैसले को अदालत ने बेशक सही ठहराया था, पर पक्षपाती राजनीति के तहत उन्होंने कई विधेयक रोक दिए थे, जिनमें स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए पचास फीसदी आरक्षण लागू करने का विधेयक भी था।
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उनकी बर्खास्तगी को विपक्षी दल बदले की कार्रवाई बता रहे हैं, तो इसकी एक वजह यही है। राजभवन को राजनीति का अखाड़ा बनाने की शुरुआत करने वाली कांग्रेस को बेशक इस मामले में बोलने का नैतिक हक नहीं है, पर भाजपा भी अगर चाहती, तो इस अप्रिय प्रसंग से बच सकती थी।