{"_id":"550b070bb4e35edd113a5497cd4e9cc4","slug":"begining-with-hope","type":"story","status":"publish","title_hn":"उम्मीद भरी शुरुआत","category":{"title":"Other Archives","title_hn":"अन्य आर्काइव","slug":"other-archives"}}
उम्मीद भरी शुरुआत
नई दिल्ली
Updated Thu, 05 Sep 2013 08:15 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
भारतीय अर्थव्यवस्था जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है, उसमें रिजर्व बैंक के नए गवर्नर के तौर पर रघुराम राजन की घोषणाएं साहसी हैं, इसमें कतई संदेह नहीं। यह जानते हुए भी, कि केंद्रीय बैंक का मुख्य काम मौद्रिक नीतियों का संचालन करते हुए मुद्रास्फीति को अंकुश में रखना है, उन्होंने लीक से हटकर समूची आर्थिक गतिविधियों को गति देने का संकेत दिया है।
विज्ञापन
बैंकिंग लाइसेंस का फैसला जल्दी करने, सरकारी बैंकों को शाखा खोलने के लिए रिजर्व बैंक की औपचारिक मंजूरी से मुक्त करने और बैंकों की गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों की वसूली में सख्ती बरतने जैसी घोषणाएं सुबूत हैं कि संकट के समय वह आर्थिक बेहतरी की तमाम संभावनाओं पर विचार करेंगे। वह अपने पूर्ववर्ती डी सुब्बाराव के रास्ते पर नहीं चलने वाले, जिन्होंने आर्थिक विकास के लिए कदम उठाने की जगह मुद्रास्फीति को अंकुश में रखने को ही तरजीह दी थी; भले उसका कोई नतीजा न निकला हो।
विज्ञापन
रिजर्व बैंक अब तक मौद्रिक नीतियों में जैसी सख्ती का परिचय देता आया था, रघुराम राजन उसे उदार बनाने की कोशिश में लगे हैं, यह भी शीशे की तरह साफ है। लेकिन चौतरफा नई शुरुआत की बात करते हुए भी रुपये को मजबूती देने की कोशिश उनके एजेंडे में सबसे ऊपर है।
विज्ञापन
वह मौद्रिक नीतियों के जरिये देश में ऐसा वातावरण बनाना चाहते हैं, जिससे निर्यात बढ़े और रुपये में लोगों का भरोसा भी वापस लौटे। उदाहरण के लिए, जल्दी ही मुद्रास्फीति से जुड़े बांड लाने की घोषणा कर वह घरेलू निवेशकों को सोने से विमुख करना चाहते हैं, तो विदेशी निर्यातकों को डॉलर के बदले रुपया देने का प्रावधान कर भारतीय मुद्रा के अंतरराष्ट्रीयकरण की साहसी योजना की रूपरेखा भी तैयार कर रहे हैं।
लेकिन तब भी लाख टके का सवाल यही है कि मौजूदा समय में रुपये के प्रति लोगों का भरोसा कैसे लौटेगा। फिर जो लोग यह मानकर चल रहे हैं कि रघुराम राजन सारी मुश्किलों का हल कर देंगे, उन्हें यह समझना होगा कि जब तक सरकार अपने खर्च में कटौती नहीं करती, सब्सिडी का बोझ कम नहीं करती, मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन नहीं बनाती, तब तक रिजर्व बैंक चाहकर भी कुछ नहीं कर पाएगा।